मिटेगी गोमती की कालिख?

गोमती को स्वच्छ और सुंदर बनाने के नाम पर कई नेता, मंत्री, ठेकेदार, अभियंता, अधिकारी और दलाल मालामाल हो गए, लेकिन नदी की दशा बिगड़ती चली गई। क्या एनजीटी और ईडी की नई कवायद में गोमती की कालिख मिटने की उम्मीद खोजी जा सकती है, विश्लेषण कर रहे हैं गोविंद पंत राजू

गोमती नदी को अक्सर उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इधर कुछ वर्षों से यह नदी प्रदूषण और भ्रष्टाचार की पहचान बनती जा रही है। गोमती के सौंदर्यीकरण और इसे स्वच्छ बनाने के नाम पर कई नेता, मंत्री, ठेकेदार, अभियंता, अधिकारी और दलाल मालामाल हो गए, लेकिन नदी की दशा और बिगड़ती चली गई। इसके काले पानी को भ्रष्टाचार की कालिख ने और भी काला बना दिया है।

मगर लगता है अब इस कालिख के मिटने के दिन आ गए हैं। इस बार पहल दो मोर्चों पर लगभग एक साथ हुई है। पहली पहल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की ओर से हुई। उसने यूपी सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा है कि गोमती एक्शन प्लान, नमामि गंगे और गोमती रिवर फ्रंट जैसी अनेक परियोजनाओं और सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी गोमती की गंदगी कम क्यों नहीं हुई? संस्था ने इस मामले में कड़ा रुख दिखाते हुए एक समिति बनाने का निर्णय किया है, जो गोमती की बदहाली पर तमाम सवालों की रिपोर्ट उसके सामने रखेगी। समिति में तीन जजों और एक पर्यावरण विशेषज्ञ को शामिल किया गया है।

एनजीटी ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए), नगर निगम, वन विभाग और जल निगम से गोमती सफाई का एक्शन प्लान भी मांगा है। उसने तय किया है कि अब इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश डीपी सिंह पूरे मामले की निगरानी करेंगे। 31 मई को एनजीटी अंतिम रूप से देखेगा कि गोमती कितनी साफ हुई और अगर साफ नहीं हुई तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है।

जल निगम के अधिकारी मानते हैं कि सिर्फ लखनऊ में ही गोमती नदी में हर रोज 720 लाख लीटर सीवर और गंदा पानी मिल रहा है। इसमें से सिर्फ 400 लाख लीटर ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों में से होकर गोमती में पहुंचता है। यानी लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नाक के नीचे ही हर रोज 320 लाख लीटर गंदगी गोमती में मिल रही है। वैसे गोमती को साफ बनाने के लिए सरकार ने ट्रीटमेंट प्लांट तकनीक से इतर भी गोमती को साफ करने और इसके पानी में घुलित आक्सीजन की मात्रा बढ़ाने के प्रयोग किए, लेकिन बड़े तामझाम और लंबी-चौड़ी लागत के बावजूद ये असफल ही रहे।

गोमती को साफ करने का काम कल्याण सिंह सरकार के दिनों में ब्रिटेन की मदद से शुरू किया गया था। मगर शुरुआती काम के बाद वह योजना अधूरी छोड़ दी गई। तब से हर सरकार ने गोमती को साफ करने पर करोड़ों खर्च किए। गोमती तो साफ नहीं हुई, हां कुछ नेताओं और उनसे जुड़े भ्रष्ट तंत्र की झोलियां जरूर भरती रहीं। दौर किसी का भी रहा हो, सत्ता और सत्ता से जुड़े भ्रष्ट तंत्र ने गोमती से खूब खाया-कमाया। अखिलेश सरकार ने गोमती को साफ और सुंदर बनाने के लिए गोमती रिवर फ्रंट के नाम से एक बड़ी योजना शुरू की थी। इसके तहत 550 करोड़ रुपए की लागत से गोमती के दोनों किनारों पर दीवारें बनाकर और नदी को गहरा कर उसके पानी के प्रवाह को तेज करने की भी योजना थी। लेकिन योजना का काम जैसे-जैसे बढ़ता गया, बजट उससे भी तेज बढऩे लगा। योजना की लागत 1513 करोड़ तक पहुंच गई, लेकिन काम आधा भी नहीं हो पाया।

पर्यावरण के प्रतिकूल बनाई गई रिवर फ्रंट योजना अखिलेश सरकार के अंतिम दिनों में ही भ्रष्टाचार के बड़े आरोपों में घिर गई थी। इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मई, 2017 तक गोमती को साफ करने और रिवर फ्रंट का पूरा काम एक वर्ष में पूरा करने का निर्देश दिया। मुख्यमंत्री ने रिवर फ्रंट में हुए भ्रष्टाचार की जांच के लिए एक आयोग बनाने की भी घोषणा की, लेकिन सारी घोषणाएं हवा-हवाई साबित हुईं। लगभग 15 महीने बाद 24 जून, 2018 को सुबह आठ बजे स्वयं मुख्यमंत्री ने अपने एक दर्जन से अधिक मंत्रियों और तमाम बड़े अधिकारियों के साथ नदी सफाई अभियान की शुरुआत की। सात महीने बीत गए हैं, लेकिन गोमती की दुर्दशा में रत्ती भर सुधार नहीं कर पाया।

शायद अब एनजीटी के दखल के बाद ही कुछ हो पाएगा। संस्था की सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट मॉनिटरिंग कमेटी (एसडब्ल्यूएमएमसी) ने लखनऊ में कचरा प्रबंधन के साथ नालों व सीवर लाइनों के जरिए गोमती में गिर रही गंदगी, होटलों के कचरे और अस्पतालों के बायोमेडिकल वेस्ट की भी निगरानी शुरू कर दी है। इससे गोमती को गंदा बनाने वाले कारणों को पहचाना जा सकेगा।

दूसरी बड़ी पहल गोमती रिवर फ्रंट के निर्माण कार्यों में हुए घोटालों की जांच के सिलसिले में हुई है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इस सिलसिले में यूपी, हरियाणा और राजस्थान में करीब डेढ़ दर्जन जगहों पर छापे मारे हैं। रिवर फ्रंट योजना से जुड़ी कंपनियों के मालिकों, इंजीनियरों और ठेकेदारों के घरों, दफ्तरों और अन्य ठिकानों पर मारे गए इन छापों में कर घोटाले से जुड़े दस्तावेज जब्त किए गिए। योगी सरकार द्वारा गठित आलोक सिंह आयोग ने अपनी जांच में रिवर फ्रंट में गड़बडिय़ां पाई थीं। इसी आधार पर पुलिस ने 19 जून, 2017 को गोमती नगर थाने में सिंचाई विभाग के 7 अभियंताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई। बाद में जांच सीबीआई को सौंप दी गई और 30 नवम्बर, 2017 को सीबीआई ने भ्रष्टाचार साहित अनेक धाराओं में केस दर्ज कर लिया। सीबीआई जांच के दौरान ही इस मामले में ईडी ने भी मनीलॉन्डरिंग का केस दर्ज करा दिया। अब लगभग 15 महीने बाद उसके छापों ने यह उम्मीद जताई है कि शायद जांच एजेंसियां रिवर फ्रंट घोटाले की तह तक जाकर असली अपराधियों पर नकेल कस सकेगी।

रिवर फ्रंट मामले में मोटे तौर पर जो गड़बडिय़ां पाई गई हैं, उनमें सबसे बड़ा मामला इसकी लागत को लेकर है। 550 करोड़ से शुरू योजना 1513 करोड़ तक पहुंच गई और उसके बाद 900 करोड़ की मांग और कर दी गई। सरकार बदल न जाती, तो यह राशि 2500 करोड़ से अधिक होनी तय थी। दूसरा मामला भुगतान को लेकर था। 60 फीसदी से कम काम के बावजूद 1437 करोड़ यानी 95 फीसदी भुगतान पहले ही कर दिया गया। तीसरा मामला ब्लैक लिस्टेड कंपनियों को काम देने का है। आरोप है कि अयोग्य कंपनियों को काम देने के लिए टेंडर की शर्तों में गुपचुप बदलाव कर दिए गए। एजेंसी को अपनी प्रारंभिक जांच में ठेकेदारों द्वारा इंजीनियरों को बड़ी रकम देने के सुबूत भी मिले हैं। माना जा रहा है कि इस सिलसिले में जल्द ही कुछ बड़े लोगों की गिरफ्तारियां हो सकती हैं। इस तरह 2019 की शुरुआत से जो संकेत मिल रहे हैं, वे लखनऊ की शान कही जाने वाली गोमती नदी को जिंदा बने रहने की उम्मीद जगाते हैं। वैसे हकीकत यह है कि स्मार्ट सिटी की दौड़ में इंदौर को पछाड़ कर पहले स्थान पर पहुंचने वाला लखनऊ अभी तो खुद की गंदगी से मकडज़ाल से ही जूझ रहा है।

सत्याग्रह वेबसाइट पर प्रकाशित लेख का संपादित अंश

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