मीडिया और मार्केट के त्यौहार

दिनेश दीनू

1893 में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश पूजा को सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव के रूप में मनाने की शुरुआत की थी। उसके पीछे उद्देश्य था कि इस सामूहिकता से अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों को एकजुट किया जाए। बाल गंगाधर तिलक का यह हथियार देश की आजादी में एक बड़ी पहल थी। इसी तरह दुर्गा-पूजा पश्चिम बंगाल में सामूहिकता का एक उत्सव बना। धीरे-धीरे जहां मराठी और बंगाली भाषा भाषी समुदाय फैला, ये उत्सव उन-उन क्षेत्रों तक पहुंचते गए।

अपने प्रारंभिक दौर में उत्सव, उत्सव जैसे ही होते रहे। खुशी और सामूहिकता को व्यक्त करने के उत्सव, लेकिन बीते दो दशकों से उत्सव धार्मिकता से हटकर मार्केट फंडा का हिस्सा बन गए हैं। ऐसा हिस्सा कि लोग हैरान-परेशान देख रहे हैं कि दरअसल उत्सव कौन मना रहा है? वर्ष भर कोई-न-कोई कारण मार्केट सजने के लिए बन ही जाता है। गणेश उत्सव महाराष्ट्र का नहीं, लगभग पूरे देश का हो गया है। घर-घर, मंदिर-मंदिर, मोहल्ले-मोहल्ले गणेश जी की स्थापना, उसके साथ पंडाल की भव्यता का कॉम्पटीशन, उससे जुड़ता मार्केट और उसके बाद भी धूमधाम का शानदार दिखावा, क्या सोशल मीडिया और टेलीविजन पर दिखने की चाहत और मार्केट की विज्ञापनबाजी ने आस्था के घर में जबरदस्ती सेंध नहीं लगा दी है।

गणेश चतुर्थी बीती और अब नवरात्रि, दुर्गा पूजा, दशहरा और दिवाली का मार्केट सजने लगा है। ऑनलाइन मार्केट तो अभी से तैयारी में जुट गया है। मेगा बचत, महा ऑफर, भयंकर सेल, कभी न और मिल पाने वाली छूट से मार्केट की तैयारी शुरू हो चुकी हैं। दुर्गा पूजा पंडाल अब सिर्फ बंगाली समुदाय की प्रमुखता वाले क्षेत्रों में नहीं, बल्कि मोहल्ले-मोहल्ले लगने को तैयार हैं, क्योंकि मार्केट और विज्ञापन का प्रश्न जो है। कौन पूजा समिति कितना विज्ञापन जुटा पाती है, पूजा की भव्यता उस पर निर्भर करती है। मार्केट का प्रदर्शन पूरे जोशोखरोश से आस्था पर भारी पड़ता हुआ दिखाई देता है।

श्रद्धा और अकीदत से मनाया जाने वाला मोहर्रम भी अब मीडिया के दिखावे में पीछे नहीं है। सड़कों पर निकलते जुलूसों की संख्या और मातम में बिजली की ट्यूबलाइटों को फोड़-फोड़ कर मातम करना, मोबाइल में रुक-रुक कर सीनाजनी और मातम की तस्वीरें डालना एक नया शगल बन गया है। थोड़ी दूर और चलें तो बारी क्रिसमस की आने वाली भी है। जाति-धर्म की सीमाओं से परे पूरा भारतीय बाजार क्रिसमस के रंग में डूब जाएगा। छोटी-मोटी सजावट के सामानों की दुकानें, जो जन्माष्टमी पर कृष्ण की मूर्तियां, झालरें और अन्य सजावटी सामान बेच रहे थे, वही दुर्गा पूजा, गणेश चतुर्थी, करवा चौथ के बाद क्रिसमस की सजावट का सामान बेचते नजर आएंगे। इनका एक फलसफा तो है ही कि कम से कम मार्केट ने तो धर्म की दीवारों को जरूर तोड़ा है।

एक नजर बाजार, बाजार की बिक्री, बाजार की बंपर छूट और ग्राहकों की बेजरूरत की क्रय-शक्ति पर डाल लेते हैं। जनवरी से लेकर दिसम्बर तक के 365 दिनों में अगर आप विभिन्न त्योहारों, सीजन-ऑफ व अन्य अवसरों को जोड़ लें, तो शायद वर्ष के दो-चार हफ्तों को छोड़कर वर्ष भर किसी न किसी अवसर पर छूट का बाजार गर्म रहता है। यह रिवाज अब ऑनलाइन या ऑफलाइन मार्केट हर मार्केट में समान रूप से अपनाया जाता है। ऐसे में यह समझ पाना मुश्किल हो रहा है कि लगभग पूरे वर्ष जो मार्केट विभिन्न अवसरों की छूट से, विशेष ऑफरों से सुसज्जित है, वह अपना शुद्ध लाभ कब कमाएगा? आखिर सब कुछ वह ग्राहकों के लिए कर रहा है, तो बेचारा खुद क्या कमाएगा-खाएगा?

और अगर यह गणित कुछ और तरीकों से लागू हो रहा है, तो अंतत: छूट के नाम पर, त्योहार के नाम पर, ऑफर के नाम पर मूर्ख बनने वाला, ऑफर और सस्ते के नाम पर अपनी जेब जबरदस्ती ढीली करने वाला उपभोक्ता ही तो है। आपको लूट कर खुद लुटने का तमाशा दिखाकर छूटवाला मार्केट खूब कमाई कर रहा है। पर हम खुश हैं कि महंगा सामान सस्ते में पा रहे हैं। किसको एलर्ट की जरूरत है? इसे कौन मार्केट विशेषज्ञ तय करेगा? बहरहाल, देखने और दिखाने के त्यौहार मुबारक!

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