मुक्केबाजी के एवरेस्ट पर मैरी कॉम

छह बार की वर्ल्ड चैंपियन, लंदन ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता, कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स की स्वर्ण पदक विजेता मैरी का मंत्र है कि ‘अगर मैं फिट रहूंगी, तो स्वर्ण पदक मेरे कब्जे में रहेगा।’ एमसी मैरी कॉम 24 नवम्बर को जब विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में 48 किलोग्राम भारवर्ग के फाइनल में यूक्रेन की हना ओखोता से भिडऩे उतरीं, तो सभी भारतीयों की सांसें थमी हुई थीं। जब मैरी कॉम पंच मारतीं, तो लोगों को लगता कि वह खुद ही रिंग में हैं। लोगों की भावनाओं और दुआओं के साथ मैरी कॉम का जोरदार खेल उन्हें वह मुकाम दिला गया, जिसकी वह हकदार भी हैं। मैरी कॉम यूक्रेन की हना ओखोता को 5-0 से हरा कर विश्व चैंपियनशिप में छह गोल्ड जीतने वाली दुनिया की पहली महिला बॉक्सर बन गईं। इससे पहले मैरी कॉम और आयरलैंड की केटी टेलर के नाम पांच-पांच गोल्ड थे।

लेकिन मैरी कॉम बनना इतना आसान नहीं होता। एक मार्च 1983 को उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर के चुराचांदपुर जिले के काडथेई गांव के बेहद गरीब परिवार में जन्मीं मैरी बॉक्सिंग रिंग में ही नहीं, बल्कि उसके बाहर भी निडरता की असली परिचायक हैं। मैंगते चंग्नेइजैंग जैसी एक आम लड़की जब संघर्ष की भट्ठी में तपती है, तब मैरी कॉम बनती है। एक किसान की बेटी के लिए बॉक्सिंग रिंग में कॅरियर बनाना आसान काम नहीं था। 2000 में डिंको सिंह ने उन्हें मुक्केबाज बनने के लिए प्रेरित किया, लेकिन घर वाले खिलाफ थे। हालांकि उनकी कड़ी मेहनत और लगन ने सबको झुकने के लिए मजबूर कर दिया। गांव में न अभ्यास करने की जगह थी और न ही सुविधाएं थीं। मुक्केबाजों को जो डाइट चाहिए होती है, वह भी उन्हें मुश्किल से ही मिल पाती थी, लेकिन उन्होंने सब बाधाओं को पार किया।

कोई 11 साल पहले की बात है। वर्ष 2007 में मैरी कॉम ने जुड़वां बच्चों को जन्म देने के बाद जब रिंग में उतरने का फैसला किया, तो हर कोई हैरान था। यह बहुत कड़ा फैसला था। एक ओर नन्हें जुड़वां बच्चे थे और दूसरी ओर विश्व खिताब। लेकिन मैरी कॉम ने मुक्केबाजी रिंग में जाने का फैसला किया। दरअसल, मैरी कॉम को कई लोगों को मुंहतोड़ जवाब देना था और यह काम वह विश्व चैंपियन बनकर ही कर सकती थीं और किया भी। 2008 में वह चौथा मौका था, जब वह विश्व चैंपियन का खिताब जीतकर लौटी थीं। हालांकि 2007 में जुड़वां बेटों को जन्म देने के बाद जब मैरी कॉम पहली बार सेलेक्शन ट्रॉयल के लिए गईं, तो यह जिम्मेदारी पुरुष टीम के एक कोच निभा रहे थे। जाहिर है, मां बनने के बाद मैरी कॉम में पहले जैसी ताकत और फुर्ती नहीं रह गई थी। मैरी कॉम ने कोच से कहा कि थोड़े दिनों में सब ठीक हो जाएगा। लेकिन कोच ने कहा कि अगर तुम फिट नहीं हो, तो घर में जाकर बैठो, बॉक्सिंग करने की क्या जरूरत है? गुवाहाटी में हुई एशियन चैंपियनशिप के लिए कैंप में गईं, तो बच्चे नौ महीने के थे। उनके पति आनलुर थोड़ा नाराज थे, लेकिन उन्होंने रोका नहीं।

गर्भावस्था के दौरान मैरी कॉम का वजन 67 किलो हो गया था। बेटों को जन्म देने के बाद वजन 61 किलो रह गया। क्या कोई सोच सकता था कि मैरी कॉम विश्व चैंपियनशिप में 46 किलो में हिस्सा ले सकेंगी। आखिरकार मैरी कॉम की मेहनत रंग लाई और वह 2008 में चीन के रिंगबो सिटी में अपना चौथा विश्व चैंपियनशिप खिताब जीतने में सफल रहीं। अभ्यास और मुकाबलों के लिए विदेश जाने के कारण वह ज्यादा समय अपने बच्चों को नहीं दे पाती हैं। अप्रैल-2018 में जब मैरी कॉम कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर लौटीं, तो उनके बच्चे उनके ऊपर टूट पड़े थे, क्योंकि वह कई महीनों से उनसे दूर थीं। मैरी कहती हैं कि दो बच्चे तो अब कुछ बड़े हो गए हैं, लेकिन तीसरा अभी छोटा है। वे मेरा साथ देते हैं, लेकिन पहले बहुत दिक्कत होती थी। हालांकि जब भी वह पदक जीतकर लाती हैं, तो बच्चे उसे लपक लेते हैं। उनकी फिटनेस देखकर कोई नहीं कह सकता कि वह तीन बच्चों की मां हैं। विरोधी पर मैरी कॉम पंच की बरसात करती हैं और बहुत तेजी से खुद को उनके प्रहारों से बचाती भी हैं। अपनी फिटनेस को लेकर उठे सवालों का भी मैरी कॉम ने न सिर्फ विश्व महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप जीतकर जवाब दिया, बल्कि वर्ष 2020 में टोक्यो ओलंपिक में भी वह भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी।

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