मोदी ब्रांड पर सुरक्षा कवच

अजय बोकिल

लखनऊ: भाजपा हर छोटी से छोटी जीत का श्रेय अपने केंद्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिल खोल कर देती है, लेकिन राज्यों में हार का ठीकरा मुख्यमंत्री अपने ही सिर पर फोड़कर शहादत की भंगिमा अख्तियार करते हैं। यदि गोवा-मणिपुर जैसे छोटे राज्यों में जीत या सरकार बनाने का सेहरा पीएम मोदी के सिर पर बंधता है, तो तीन बड़े राज्यों में हार की जिम्मेदारी में उनकी भागीदारी क्यों नहीं बनती? क्या भाजपा भी कांग्रेस के नक्शेकदम पर है?

क्या भाजपा भी चुनावी हार की जिम्मेदारी तथा जीत के श्रेय के मामले में अब कांग्रेस के नक्शे कदम पर चलने लगी है? यह सवाल इसलिए कि मध्यप्रदेश सहित तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार की जिम्मेदारी स्वीकारने को लेकर संबंधित राज्यों के निवर्तमान मुख्यमंत्रियों के बयानों में विनम्रता और ‘अपराध स्वीकृति’ का एक खास और तयशुदा पैटर्न दिखा। लगा कि इसकी स्क्रिप्ट पहले से लिखी हुई है और हर ‘एक्टर’ ने उसकी अदायगी अपने अंदाज में की। यूं छत्तीसगढ़ के निवर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और मप्र के निवर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तो स्वभाव से ही विनम्र हैं, लेकिन हार को स्वीकारने की चौकाने वाली विनम्रता राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की थी। उन्होंने भावहीन चेहरे के साथ हार का दायित्व स्वीकार किया। ऐसा लगा कि हर मुख्यमंत्री को अपने-अपने राज्यों में हार स्वीकारने की हिदायत ऊपर से मिली थी। उन सभी का बेसिक बयान एक-सा था, लेकिन उसका विस्तार मुख्यामंत्रियों ने अपनी तासीर के हिसाब से किया। इसे चाहे तो पॉलिटिकल कन्फेशन (राजनीतिक अपराध स्वीकृति) कह सकते हैं या फिर यह कह सकते हैं कि यह मोदी ब्रांड का सुरक्षा कवच है।

अगर तीनों मुख्यमंत्रियों की पराजय स्वीकारोक्तियों को बारीकी से समझें, तो डॉ. रमन सिंह की हार कबूली उनके स्वभाव के मुताबिक सहज और बगैर कोई नाटकीयता लिए थी। डॉ. रमन सिंह ने कुछ बुझे हुए, लेकिन बेलाग अंदाज में कहा कि चूंकि यह चुनाव मेरे ही नेतृत्व में लड़ा गया था, इसलिए हार की नैतिक  जिम्मेदारी भी मैं ही लेता हूं। यह चुनाव राज्य की नीतियों और कार्यक्रम के आधार पर लड़ा गया था। लेकिन विधानसभा चुनाव परिणामों का असर आगामी 2019 के लोकसभा चुनावों पर नहीं पड़ेगा।

मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने हार की जिम्मेदारी कुछ भावुक, तो कुछ चुटकी लेने के अंदाज में ली। इसकी स्क्रिप्ट भी लगभग वैसी थी, जो डॉ. रमन सिंह ने बोली थी। शिवराज ने भी कहा कि चुनाव मेरे ही नेतृत्व में लड़ा गया था, इसलिए पराजय की जिम्मेदारी भी पूरी तरह मेरी है। मेरे 13 साल की कार्यकाल के दौरान किसी को भी मेरी वजह से कष्ट हुआ हो, तो मैं उसकी माफी मांगता हूं। भाजपा अब विपक्ष की भूमिका में जनता के हितों की चौकीदारी करेगी। शिवराज, रमन की तुलना में कुछ ज्यादा बोले, क्योंकि उनकी पार्टी चुनावी ट्वेंटी-ट्वेंटी में रन आउट ही हुई थी, छत्तीसगढ़ की तरह क्लीन बोल्ड नहीं हुई थी। शिवराज ने फलसफाना अंदाज में कहा लोकतंत्र में अंकगणित, राजनीतिक गणित पर कई बार भारी पड़ता है। अर्थात भाजपा ज्यादा वोट लेकर भी कम सीटें जीत पाई और कांग्रेस कम वोटों के बूते पर भी ज्यादा सीटें लेकर सत्ता हासिल कर ली। तीसरी पराजय स्वीकारोक्ति ‘महारानी’ वसुंधरा राजे की थी। उन्होंने अपनी हार भी ठसक के अंदाज में स्वीकार की। उनका चेहरा भावविहीन था। वसुंधरा ने कहा कि मुझे जनता का फैसला स्वीकार है। भाजपा ने पिछले पांच सालों में लोगों के लिए काफी काम किया है।

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विधानसभा चुनावों की दिलचस्प बात यह भी थी कि जहां मप्र में भाजपा लगातार महाराज (ज्योतिरादित्य सिंधिया) पर राजनीतिक हमले कर रही थी, वहीं राजस्थान में वह ‘महारानी’ का जमकर बचाव कर रही थी। इस दोनों के बीच राजनीतिक नैतिकता कराह रही थी। कहा जा सकता है कि यदि तीनों मुख्यमंत्रियों ने चुनावी पराजय को स्वीकार किया, तो इसमें गलत क्या है? लेकिन इसमें पेंच यह है कि भाजपा हर छोटी से छोटी जीत का श्रेय अपने केंद्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिल खोल कर देती है, लेकिन राज्यों में हार का ठीकरा  मुख्यमंत्री अपने ही सिर पर फोड़कर शहादत की भंगिमा अख्तियार करते हैं। यहां प्राइमरी स्तर का सवाल यह है कि यदि गोवा-मणिपुर जैसे छोटे राज्यों में जीत या सरकार बनाने का सेहरा पीएम मोदी के सिर पर बंधता है, तो तीन बड़े राज्यों में हार की जिम्मेदारी में उनकी भागीदारी क्यों नहीं बनती?

जबकि हकीकत यह है कि इन राज्यों में मोदी ने भी खूब प्रचार किया, लेकिन वह चुनाव परिणामों में फलीभूत नहीं हुआ। अभी तक हर चुनावी जीत पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पार्टी के दिल्ली मुख्यालय में मंद-मंद मुस्कान के साथ नमूदार होकर नजराना मोदी की नीतियों को देते नजर आते रहे हैं, लेकिन एकसाथ तीन राज्यों में भारी हार के बाद उनका कोई बयान तक नहीं आया। उल्टे तीनों मुख्यमंत्री अपनी हार की स्वीकारोक्ति में भी यह सावधानी बरतते दिखे कि पराजय का काला छींटा आलाकमान के कपड़ों पर न पड़े। तो क्या एक ही पार्टी की राज्य सरकार और केंद्र सरकार की नीतियों में अंतर है? बुनियादी रूप से यह कांग्रेस की संस्कृति रही है और यही सत्ता की संस्कृति में तब्दील हो चुकी है। जिसमें मीठा आलाकमान के मुंह में और हर तीखा स्थानीय नेतृत्व के गले मढ़ दिया जाता है। यह अजीब और अनचाही लेकिन जबरिया सियासी शहादत है।

ठंडे दिमाग से सोचें कि किसी भी सरकार के जनता द्वारा अस्वीकरण के पीछे किसी एक व्यक्ति, संगठन अथवा नीति का दोष नहीं होता। सरकारें लोगों के दिलों से कई कारणों से उतरती हैं। इनमें अव्वल तो सत्ता का अहंकार होता है, जिससे बिरले नेता बच पाते हैं। सत्ता मिलते ही मनमर्जी उनकी कार्यशैली का सूत्रवाक्य बन जाती है। हर गलत को भी सही ठहराना उनका दुराग्रह बन जाता है। उनकी हर अदा ‘हमसे है जमाना, जमाने से हम नहीं’ वाली हो जाती है। भाजपा के मुख्यमंत्रियों की पराजय स्वीकारोक्ति में यह ‘ऊपर का दबाव’ और ‘दर्द’ आसानी से बूझा जा सकता है। वास्तव में कांग्रेस हो या भाजपा, यह ऐसा निर्मम ‘राजनीतिक अकेलापन’ है, जो बरसों सत्ता में रहकर सत्ताविहीन होने वाला ही समझ सकता है।

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