मोदी-शाह के दावे और बीजेपी नेताओं के छूटते पसीने

दिल्ली ब्यूरो: चुनाव की घोषणा होगी। सब मैदान में अब कूद पड़ेंगे। मैदान में तो पहले से ही नेता अड़े हुए है। उनके दावे भी कम नहीं। सबसे बड़े दावे बीजेपी नेताओं के हैं। और खासकर पीएम मोदी और अमित शाह के। उनकी हुंकार अचरज पैदा करती है और कायकताओं को बल भी प्रदान करती है। विपक्ष को हतोत्साहित भी करती है। लेकिन अंदरखाने की कहानी कुछ और ही है। पीएम मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भले कितना भी आत्मविश्वास दिखाएं और भाजपा के नेता दावा करें कि पुलवामा व बालाकोट के बाद अब भाजपा की जीत पक्की हो गई है पर असल में विपक्षी गठबंधन ने भाजपा नेताओं की नींद उड़ाई है।

तभी भाजपा के नेता छोटी पार्टियों के आगे सरेंडर करके तालमेल कर रहे हैं। ताजा मामला झारखंड का है। झारखंड में भाजपा ने अपनी छोटी सहयोगी पार्टी आजसू के लिए लोकसभा की एक सीट छोड़ी है। जबकि कुछ दिन पहले खबर थी कि भाजपा उसे घास नहीं डाल रही है और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने आजसू नेता को कह दिया है कि वे अपनी पार्टी का भाजपा में विलय कर लें या अलग लड़ें। पर अचानक भाजपा ने अपना रुख बदला और आजसू के लिए अपनी जीती हुई गिरिडीह की सीट छोड़ दी। इससे अंदाजा लग रहा है कि भाजपा को विपक्षी गठबंधन का मुकाबला करने के लिए एक मजबूत गठबंधन की जरूरत है।

इसी वजह से भाजपा ने बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पंजाब आदि सभी राज्यों में अपनी पुरानी सहयोगी पार्टियों के साथ तालमेल किया है। हर जगह भाजपा ने कंप्रोमाइज किया है। महाराष्ट्र में भी भाजपा ने पुराना फार्मूला बदला और 26 की बजाय 25 सीट पर लड़ने को राजी हुई। इससे पहले भाजपा को 26 और शिव सेना को 22 सीट मिलती थी। इस बार शिव सेना को 23 सीट मिली है। इसी तरह बिहार में दो लोकसभा सांसदों वाली पार्टी जदयू के साथ भाजपा ने 17-17 सीटों पर लड़ने का समझौता किया। भाजपा ने तमिलनाडु में तो सिर्फ पांच सीटें लड़ना कबूल कर लिया। ऐसे ही उत्तर प्रदेश में भाजपा ने जैसे तैसे अपनी दोनों सहयोगी पार्टियों को मना कर गठबंधन बनाए रखा है।

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