यहां मुर्दों के साथ घर में रहते हैं लोग, रखते हैं जिंदा इंसानों की तरह

लखनऊ: इस दुनिया में कई ऐसी जनजातियां रहती है जिनके रीति और रिवाज जानकर हर कोई चकित है। आज आपको एक ऐसे समुदाय के बारे में बताने जा रहे है जो अपने घर में मुर्दों के साथ रहते है। जी हां, इंडोनेशिया के दक्षिण सुलावेसी द्वीप पर रहने वाली तोराजा समुदाय के लोग रहते है। ये लोग मुर्दों को अपने घर में ही जिंदा सदस्य के तौर पर रखते है।

दरअसल ऐसा करने की वजह यह है कि इन लोगों में अंतिम संस्कार बहुत खर्चीला होता है। कई पशुओं की बलि देकर पूरे समाज को खिलाना-पिलाना होता है। इस तरह अंतिम संस्कार कई दिनों तक चलता है। जिसमें इंडोनिशया में सालाना मिलने वाली एवरेज सैलरी से भी कई ज्यादा खर्च हो जाता है। यही कारण है कि जब तक अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं जुट जाते, परिवार मृत सदस्य को अपने साथ ही रखता है।

इस रिवाज के कारण परिवार वाले मृत शरीर से जिंदा शख्स की तरह व्यवहार करते है। रोजाना उसके लिए खाना-पानी, कपड़े, साफ-सफाई, यहां तक कि सिगरेट वगैरह का इंतजाम भी किया जाता है। आपसी बातचीत में भी उसके लिए ऐसे शब्दों का प्रयोग करते हों, मानो वे जिंदा हों और बस बीमार हों। इस परिवार की सदस्य मामक लिसा जब किसी गेस्ट से बात करती है, तो कहती है कि उसके पिता बीमार हैं। वह घर के एक कमरे में ताबूत में लिटाकर रखी गई डेड बॉडी के पास जाकर पूछती है कि बाहर से कुछ लोग आपसे मिलने आए हैं, इससे आपको परेशानी तो नहीं होगी?

यह अकेला परिवार नहीं है, जो ऐसा कर रहा है। इंडोनेशिया के दक्षिणी सुलावेसी द्वीप पर रहने वाली तोराजा कम्युनिटी में यह एक आम रिवाज है। वे लोग शव को दफनाए जाने से पहले घर में ही रखते हैं। इस दौरान मुर्दे के भीतर इंजेक्शन से फार्मेलिन रसायन डाला जाता है, ताकि वह सड़े नहीं। उसे ताबूत में लिटाकर घर के भीतर ही रखा जाता है। उसके लिए बाकायदा खाना, नाश्ता, पानी आदि का इंतजाम होता है। रोज उसके कपड़े बदले जाते हैं, रात को ढीले कपड़े पहनाए जाते हैं। इस दौरान परिवार के सदस्य दैनिक व्यवहार और बातचीत में मृत सदस्य को जीवित की तरह ही ट्रीट करते हैं।

स्थानीय भाषा में इस रिवाज को माएने कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, शवों को साफ करने का समारोह। इस दौरान बुजुर्गों ही नहीं, बच्चों के शवों को भी बाहर निकाला जाता है। शवों को कब्रों से निकालकर वहां ले जाया जाता है, जहां व्यक्ति की मौत हुई थी, फिर उसे गांव लाया जाता है। गांव तक लाने के दौरान सीधी रेखा में चला जाता है। इस दौरान मुडऩा या घूमना वर्जित होता है।

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