यह हैं महाभारत से जुड़े रहस्यमय श्राप, वचन और आशीर्वाद

नई दिल्ली : महाभारत एक ऐसा ग्रंथ है जिसमे भारत ही नही विश्व इतिहास का रहस्य छुपा हुआ है। महाभारत में कई घटना, संबंध और ज्ञान-विज्ञान के रहस्य छिपे हुए हैं। इस विषय में जितनी भी खोज हुई और जो तथ्य मिले है वें मानव इतिहास से परदा उठाते है। महाभारत से जुड़े शाप, वचन और आशीर्वाद में भी रहस्य छिपे हैं, क्योंकि महाभारत का हर व्यक्ति रहस्यमय था।

हम सब महाभारत की अनेक कहानिया जानते है या धारावाहिक में देख चुके है फिर भी इस कथा की कई घटनाए और चरित्र ऐसे है जो हम नही जानते। आओ हम जानते हैं ऐसे कुछ व्यक्तियों के बारे में जिनमें अद्भुत क्षमता थी। वे आम मनुष्यों की तरह नहीं थे। आज हम जानेंगे बर्बरीक के बारे में।

बर्बरीक : ये भीम के पौत्र थे और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। वे इतने पराक्रमी थे की उनके केवल तिन बाण से ही संपूर्ण कौरव और पांडव सेना का विनाश हो सकता था। उन्होंने एक घोषणा की थी जो कृष्ण के चिंता का कारण थी। वे युद्ध के मैदान के मध्य एक पीपल के पेड़ निचे खड़े हो गये और घोषणा कर दी “मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा।”

इस घोषणा से चिंतित कृष्ण और अर्जुन जब बर्बरीक की शक्ति कि परिक्षा लेने पहुंचे तो उसकी वीरता का नमूना मात्र देखके ही हैरान हो गये। कृष्ण ने जब बर्बरीक से कहा था ये जो वृक्ष है इसके सारे पत्तों को एक ही तीर से छेद दो तो मैं मान जाऊंगा। श्री कृष्ण की आज्ञा से एक तीर को नमन कर के वृक्ष की ओर छोड़ दिया। वो तीर एक एक पत्ते को छेदता जा रहा था तब एक पत्ता टूटकर निचे गिर पड़ा, कृष्ण ने चालाकी से उसे पैर के निचे छुपा लिया ताकि यह छेद होने से बच जाएगा।

सभी पत्तों को छेदते हुए वह तीर कृष्ण के पैरों के पास आकर रुक गया। तब बर्बरीक ने विनम्रता से कहा “प्रभु आपके पैर के नीचे एक पत्ता दबा है कृपया पैर हटा लीजिए, क्योंकि मैंने तीर को सिर्फ पत्तों को छेदने की आज्ञा दे रखी है आपके पैर को छेदने की नहीं।”

भगवान श्री कृष्ण यह बात जानते थे की बर्बरीक अपनी प्रतिज्ञा की वजह से हारने वालों का ही साथ देगा और ये बात उनकी चिंता बढ़ाये जा रही थी क्यों की अगर कौरव हारते हुए नजर आये तो पांडवों के लिए संकट खड़ा हो जायेगा, बर्बरीक के एक तीर से पूरी पांडव सेना का का नाश हो जायेगा।

इस समस्या से निपटने के लिए श्रीकृष्ण ब्राह्मण का भेष बनाकर सुबह बर्बरीक के शिविर के द्वार पर पहुंच गए और दान मांगने लगे। कृष्ण की योजना से अंजान बर्बरीक ने का – “मांगो ब्राह्मण! क्या चाहिए?” ब्राह्मणरूपी कृष्ण ने कहा कि” तुम दे न सकोगे।” इस पर बर्बरीक द्वारा वचन पाकर कृष्ण ने उसका शीश मांग लिया। बर्बरीक कृष्ण के जाल में फंस गए।

अपने पितामह पांडवों की विजय कराने हेतु बर्बरीक ने स्वेच्छा से अपना शीशदान देकर प्राण त्याग दिए। बर्बरीक के महान बलिदान से पांडव सेना विजयी हुई उसके इस बलिदान को देखते हुए कृष्ण ने बर्बरीक को कलियुग में स्वयं के नाम से पूजित होने का वर दिया। जहां कृष्ण ने उसका शीश रखा था उस स्थान का नाम खाटू है। आज बर्बरीक को खाटू श्याम के नाम से पूजा जाता है।

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