राम के नाम पर वोट बटोरने की तैयारी

अखिलेश अखिल

चारो तरफ राम ही राम है। घट घट में राम। इसे भला कौन सनातनी नहीं जानता। राम है तो जहां है। जहां राम नहीं वहाँ कुछ कहाँ ! देश के सामने राम की चाहत है लेकिन प्राथमिकता में राम नहीं। देश की प्राथमिकता में तो राम से आगे की चीज है। सारे लोग जिस राम को भज कर सब कुछ पाना चाहते हैं ,वैतरणी पार लगना चाहते है वही चाहत सरकार से नहीं। सरकार से तो जनता की चाहत सबके कल्याण को लेकर है। रोजगार को लेकर है और बेहतर शिक्षा और बेहतर इलाज को लेकर। देश की सुरक्षा मजबूत रहे इसकी चाहत है। जनता की चाहत सरकार के उन वादों को पूरा करने से जुडी है जो अब तक संभव नहीं हो सका। सरकार अब उन मुद्दों और वादों पर चर्चा नहीं करती। सामने चुनाव है। सरकार को लग गया है कि उनके विकास के सारे दावे जनता के सिर नहीं चढ़ रहे। सरकार परेशान और पार्टी बदहवास होकर संघ से मिले। मंत्रणा हुयी। भुलाये गए मुद्दों पर विचार किये गए। राम फिर से प्रकट हो गए। ऐलान हुआ राम नहीं तो सरकार नहीं। पार्टी की हार हो जायेगी अगर राम मंदिर नहीं बनेगा। फिर क्या था रणनीति बनी। कूटनीतिक चाले चली गयी। संत महात्माओं से मंत्रणा की गयी। तय हुआ कि राममंदिर मसले को जगाना है ताकि विधान सभा चुनाव में इसका सर दिखे। बात बन गयी तो ठीक वरना लाभ तो मिलेगा ही। और अगर बात बन गयी तो लोकसभा चुनाव इसी के जरिये सफल हो जायेगे। पार्टी की जीत होगी और फिर मोदी गद्दी पर बैठेंगे। तब जाकर हिन्दू राष्ट्र की बाते सफल होगी।

पिछले महीने संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बड़ी ही चालाकी से राम मंदिर के विवादास्पद मुद्दे को चुनाव मैदान में उछाल दिया। .उन्होंने साफ़ लफ्ज़ों में हिंदू संत समाज से इस मुद्दे को उठाने की अपील की, भले ही इससे सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश या संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन होता हो। भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनीतिक फ़िज़ा जिस तरह से ख़राब हो रही है, इस बात को ध्यान में रखते हुए सत्ता में वापसी के लिए भाजपा को हर दांव चलने की ज़रूरत है। जैसे ही संघ प्रमुख ने राम मंदिर का राग छेड़ा ,चारो तरफ हाहाकार मच गया। देश के हर एक कोने से बीजेपी और संघ से जूस लोग राम मंदिर के नारे लगाने लगे। यूपी में मानो तूफ़ान खड़ा हो गया हो। वहां कई बैठके हुयी। संतो से विचार हुए। योगी के लोगो से मंत्रणा हुयी और फिर मंत्री से लेकर पार्टी के लोग मंदिर के राग अलापने लगे। लड़ाई से लेकर आंदोलन की बातें करने लगे। एक संघ नेता ने राम मंदिर के लिए संसद में निजी बिल लाने की वकालत भी करने लगे।

देश भौचक हुआ। राम मंदिर के नाम पर फिर आंदोलन। कई जगह से सवाल उठे। क्या 6 दिसंबर को फिर कुछ होगा क्या ? सहमे लोग ठिठुरने लगे। लेकिन जनता के कुछ नुमाइंदे सवाल भी खड़े किये। किसके खिलाफ आंदोलन ? ऊपर से नीचे तक जब बीजेपी की ही सरकार है तो आंदोलन किसके खिलाफ ? कोई जबाब नहीं। जबाब देगा भी कौन ? कोई सामने आने को तैयार नहीं। जानकार मान रहे हैं कि यह सब गिडार भभकी है ताकि विधान सभा चुनाव में बेरा पार लग जाय। और अगर जीत हुयी तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश आने का इन्तजार किया जाय या फिर विधान सभा चुनाव में हार हो गयी तो राम मंदिर बनाने की दुदुम्भी बजा दी जाय। चाहे जितना भी लहू बहे। आगे जो लोक सभा चुनाव है। उसे तो जितना जरुरी है।

अब कुछ राजनीतिक बातें। साल 2014 में मिली क़ामयाबी को फिर से दोहरा पाने के आसार कम ही दिखाई देते हैं। पिछले महीने जहाँ एक तरफ़ मोहन भागवत ये कहते हैं कि साधुओं को अगुवाई करनी चाहिए, वहीं हज़ारों किसान खेती-किसानी के मुद्दे पर सरकार की उदासीनता के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के लिए दिल्ली की तरफ़ कूच कर रहे थे। वे राजधानी में दाख़िल न हो सकें, इसलिए पुलिस ने पानी की बौछारों और आँसू गैस के गोलों से उन्हें रोकने की कोशिश की.हीं महाराष्ट्र में किसानों ने टमाटर की फसल खेत में ही छोड़ दी क्योंकि इसकी कीमतें उनकी लागत से भी काफ़ी कम हो गई थीं। बाक़ी देश में ख़ूनी भीड़ की दरिंदगी और वर्दी पहने पुलिसवालों के हाथों हत्याओं का सिलसिला बेरोकटोक जारी है।

सुप्रीम कोर्ट नेकहा है कि राम मंदिर विवाद पर फ़ैसला जनवरी में हो सकता है।लेकिन ये दिखाई देता है कि मोहन भागवत इस फ़ैसले का इंतज़ार नहीं करना चाहते। वे कहते हैं कि हिंदू संत समाज पर सरकार की तरह कोई बंदिश नहीं है और उन्हें राम मंदिर के मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहिए। मोहन भागवत का ये बयान एक खुला निमंत्रण है कि भगवा पहने हिंदू संत समाज आगे आकर नेतृत्व करे। भगवत के फैसले के बाद से ही देश भर के संत समाज गोलबंद हो रहे हैं और पिछले तीन दिनों से दिल्ली में संतों की बैठक भी चल रही है। बैठक से आवाज यही आ रही है कि हम मंदिर बनाएंगे कोई रोक नहीं सकता। लेकिन सवाल है कि आखिर मंदिर को रोक कौन रहा है। अब ये संकेत मिल रहे हैं कि अलग-अलग मठों और पंथों के धर्म गुरुओं को इस मुहिम की अगुवाई दी जा सकती है। मोहन भागवत ने ये भी कहा है कि विपक्ष में किसी के पास इतना माद्दा नहीं होगा कि कोई राम मंदिर का निर्माण रोक सके।

बता दें कि विवाद राम मंदिर के निर्माण को लेकर नहीं है बल्कि उस जगह पर इसके निर्माण को लेकर है जहाँ साल 1992 में बीजेपी, संघ समर्थकों और अनुयायियों ने बाबरी मस्जिद को जमींदोज़ कर दिया था। संघ को इस बात का भी आसरा है कि कांग्रेस पार्टी इन दिनों ‘नरम हिंदुत्व’ की अपनी राजनीति को चमकाने में मसरूफ़ है। साल 1989 से 1992 के दरमियाँ जब ये मस्जिद ढहा दी गई तो बीजेपी ने अपने इसी मुख्य एजेंडे के साथ अभियान चलाने का फ़ैसला किया था। लेकिन उस वक़्त भी भले ही भाजपा को इसका चुनावी फ़ायदा मिला था लेकिन पार्टी उत्तर प्रदेश में बहुमत हासिल करने से चूक गई। हालांकि भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर उभरी और उसने कांग्रेस को चुनौती दी। साल 1996 के चुनाव में वो सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

बता दें कि भारत में रामायण शायद सबसे ज़्यादा पसंद किया जाने वाला महाकाव्य है। भारत में ‘रामलीला’ हर साल एक बड़े पर्व के तौर पर आयोजित की जाती है। हज़ारों की भीड़ इसे देखने के लिए मैदानों में इक्ट्ठा होती है। रामलीला भारत के लोक थियेटर और रंगमंच का भी हिस्सा है। इसलिए संघ प्रमुख मोहन भागवत को कोई ये बताये कि उनके संस्थान की स्थापना 1925 में हुई थी, लेकिन भारतीय लोग सदियों से रामलीला आयोजित करते रहे हैं। दरअसल, संघ और भाजपा उत्तर भारतीयों के सबसे प्रिय देवता राम से राजनीतिक मुनाफ़ा अर्जित करना चाहती है। यही उसका मक़सद है। संघ ख़ुद को राम का सबसे बड़ा भक्त संगठन बताता है और अपने स्वयंसेवकों को सच्चा देशभक्त, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने देश की आज़ादी के आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया था। लेकिन धार्मिक भावनाओं का फ़ायदा उठाने वाले राजनीतिक दल यानी बीजेपी आसानी से ‘राम’ को एक मुद्दा बना रहे हैं। आगे क्या होगा देखने की बात है।

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