राम पर संग्राम

अखिलेश अखिल

सामने जब लोकसभा चुनाव हों और वर्षों से राम मंदिर के नाम पर वोट उगाहने की प्रवृत्ति रही हो, ऐसे में पिछले एक पखवाड़े में धर्म संसद के नाम पर जो बातें सामने आ रही हैं, उससे साफ हो गया है कि देश के साधु समाज से लेकर अखाड़ा की राजनीति करने वाले धर्मवेत्ता बंट चुके हैं। धर्म संसद दो फाड़ हो चुका है। भाजपा की राममंदिर की राजनीति का पर्दाफाश हो चुका है। सीएम योगी का कुंभ पुन: अर्धकुंभ बन कर रह गया है।

कुंभ की धार्मिक राजनीति में सबसे पहले परम धर्म संसद में राम मंदिर बनाने का ऐलान किया गया। ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वरूपानंद सरस्वती की अगुवाई में 28 से 30 जनवरी तक चली धर्म संसद में कहा गया कि साधु-संत प्रयागराज से सीधे अयोध्या जाएंगे और 21 फरवरी को वहां राम मंदिर के शिलान्यास का कार्यक्रम होगा। स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि अगर अयोध्या में एकत्रित हुए लोगों को गोलियों को सामना करना पड़ेगा, तो भी कदम पीछे नहीं हटेंगे। इस धर्म संसद के तुरंत बाद विहिप ने अपनी अलग धर्म संसद की। इसमें आए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि राम मंदिर से एक इंच भी समझौता नहीं होगा। हमें उसी तरह का राम मंदिर चाहिए जैसा हम लोगों को दिखाते रहे हैं। भागवत के धर्म संसद में भाषण दिए जाने के बाद संतों ने हंगामा शुरू कर दिया। धर्म संसद में करीब दो दर्जन से ज्यादा संतों ने ‘तारीख बताओ, तारीख बताओ’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। बस यही भाजपा के लिए संकट का सबब बन गया है।

उधर, धर्म संसद आयोजित करने वाले संतों के खेमेबाजी भी देखने लायक है। एक तरफ संघ और विहिप है, जो भाजपा का समर्थन करती है। दूसरी ओर, शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती और कंप्यूटर बाबा हैं, जो खुलेआम भाजपा, आरएसएस और विहिप को मंदिर के नाम पर वोट जुगाडऩे वाले संगठन बता रहे हैं। दरअसल, राम मंदिर भाजपा का मुख्य मुद्दा रहा है। इसी मुद्दे पर सवार होकर उसने केंद्र और कई राज्यों में अपनी सरकारें बनाईं। केंद्र में पार्टी की सरकार होने के चलते वह सीधे मंदिर निर्माण की घोषणा कर नहीं सकती। इसलिए वह हिंदूवादी संगठनों तथा साधु-संतों को ढाल बनाकर इस मुद्दे को 2019 के आम चुनाव तक किसी भी कीमत पर ठंडा नहीं पडऩे देना चाहती। इसीलिए वह तंबू में विराजमान रामलला को शीघ्र ही भव्य मंदिर में स्थापित करने की आशा हिंदुओं के मन में जगाए रखने के साथ कोर्ट की सुनवाई लटकाने का आरोप लगाकर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को हिंदूविरोधी होने का प्रमाणपत्र देने की कोशिश में लगी है। इस पूरी कवायद की बंदूक चलाने के लिए साधु-संतों से बेहतर कंधा भाजपा को भला और कहां मिल सकता है? इसके बावजूद भाजपा की हालत विचित्र हो गई है। राम मंदिर का मुद्दा हाथ से निकलते देख संघ, भाजपा और हिंदू संगठनों को धक्का लग रहा है। विहिप के तमाम प्रयासों के बाद भी संतों का बड़ा धड़ा इस मुद्दे पर अब सरकार को घेर रहा है। हालत यह है कि विहिप विरोधी संत अब फ्रंट फुट पर हैं और संघ उन्हें मनाने के लिए दाव-पेंच आजमा रहा है।

इस बीच अब कुंभ में कांग्रेस ने भी इंट्री ले ली है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने पिछले दिनों शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती और कंप्यूटर बाबा से मिले। इसके बाद कंप्यूटर बाबा ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में मोदी सरकार के खिलाफ तीन प्रस्ताव पारित कर दिए। पहला प्रस्ताव था कि अयोध्या में राम मंदिर का वादा पूरा नहीं करने पर मोदी माफी मांगें। मंदिर निर्माण के लिए संत समाज ने 24 दिन का समय दिया और सरकार को अध्यादेश लाने की चुनौती दी। तीसरा प्रस्ताव था कि हिंदू देवी-देवताओं पर जातिगत टिप्पणी करने वालों के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का केस चलाया जाए। अब सबकी नजरें 21 फरवरी पर टिकी हैं। उधर, अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी महाराज ने कहा कि राम मंदिर मुद्दे को लेकर संत समाज बेहद गंभीर है। अगर शंकराचार्य ने आह्वान किया, तो संत समाज उनके साथ अयोध्या कूच करेगा।

दूसरी ओर, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास की घोषणा करने वाले शंकराचार्य स्वरूपानंद के शिविर में शिलापूजन का काम शुरू हो गया है। जगह-जगह से श्रद्धालु शिलाएं भी लेकर आ रहे हैं। इस कार्यक्रम को ‘रामाग्रही सविनय आंदोलन’ नाम दिया गया है। स्वरूपानंद के शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने शिविर में रखी गई मंदिर निर्माण से जुड़ी शिलाओं को दिखाते हुए बताया कि इन शिलाओं का नामकरण भी कर दिया गया है। कुछ शिलाओं का नाम नंदा, भद्रा, जया और पूर्णा रखा गया है। बाकी शिलाओं का भी नामकरण किया जा रहा है। अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया कि अयोध्या में शिलान्यास करने की योजना पर रोजाना काम चल रहा है। पहले शंकराचार्य शिलाएं लेकर अयोध्या के लिए कूच करेंगे, उनके पीछे-पीछे शिष्य और भक्तों की टीम चलेगी।

उधर, भाजपा हतप्रभ है। योगी को कुछ सूझ नहीं रहा है। संघ परेशान है। तीन राज्यों के विधानसभा और कई लोकसभा उप-चुनावों के परिणामों ने भाजपा के सामने स्पष्ट कर दिया है कि ‘सबका साथ सबका विकास’ वाला नारा और केंद्र की बहुप्रचारित कल्याणकारी योजनाएं वोटों की वर्षा कराने में कारगर नहीं हो पा रही हैं। भावनात्मक और आस्था के मुद्दे भड़काए और भुनाए बगैर उसकी चुनावी नैय्या पार नहीं लगने वाली है। इसीलिए पिछले कुछ महीनों से पार्टी लगातार राम मंदिर मुद्दे को अप्रत्यक्ष रूप से हवा देती रही है। लेकिन अब जब यह मुद्दा भी उसके हाथ से निकलकर कांग्रेस के हाथ में जाता दिख रहा है, तो आगे कुछ भी होने की संभावना है। कुछ लोग कोलकाता की घटना को भी इसी से जोड़कर देख रहे हैं।

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