रावण की रिहाई कराकर भाजपा ने पश्चिमी यूपी में चला बड़ा दांव

धनंजय सिंह

लखनऊ ब्यूरो। भीम आर्मी संस्थापक चंद्रशेखर उर्फ रावण की रिहाई कराकर भाजपा सरकार ने पश्चिमी यूपी में एक बड़ा दांव चला है। एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद भाजपा सरकार ने रावण को रिहा करके दलित राजनीति को हिला दिया है। रावण के रिहा होते ही बसपा नेतृत्व में खलबली मची है तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की सक्रियता भी बढ़ गई है। रावण की रिहाई से पश्चिमी यूपी की दलित राजनीति के समीकरण बदल गए हैं। रावण की रिहाई से बसपा सुप्रीमों में बेचैनी बढ़ गई है, जो पश्चिमी यूपी की राजनीति पर बसपा नजर बनाये हुए है कि उसकी रणनीति क्या होगी। जानकारों का मानना है कि वह किसी दल के अपेक्षा अपना नया दल बना कर राजनीति अजमा सकता है।

सहारनपुर में दलित आंदोलन की कमान लेकर उभरी भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर उर्फ रावण की रासुका के कारण जेल से रिहाई नहीं हो पा रही थी। भाजपा की केंद्र व राज्य सरकारों पर दलितों के साथ भेदभाव का आरोप लगाकर भीम आर्मी और दूसरे राजनीतिक दल लगातार आंदोलन कर रहे थे। इसके बाद केंद्र ने एससी-एसटी एक्ट में संशोधन कर दिया। दलित राजनीति को अपने पाले में करने के लिए राज्य सरकार ने अब भीम आर्मी संस्थापक चंद्रशेखर रावण को रिहा करके बड़ा दांव चला है। इस दांव के जरिए भाजपा अपने मनमाफिक परिणाम पाने की कोशिश में जुटी है।

जेल से 15 माह बाद रिहा हुए रावण पर राजनीतिक दलों के नेता डोरे डाल रहे हैं। बसपा नेतृत्व तो रावण को कमजोर करने की कोशिशों में जुटा है लेकिन कांग्रेस, रालोद, आम आदमी पार्टी के नेता रावण को अपने साथ आने के लिए उस पर डोरे डाल रहे हैं। गुजरात के दलित नेता जिग्नेश मेवाणी की सक्रियता से रावण के राजनीति में आने की संभावना प्रबल है। भीम आर्मी कार्यकर्ताओं का कहना है कि अभी पार्टी का नाम फाइनल नहीं हुआ है लेकिन रावण 2019 में सहारनपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे। रावण को अपने पाले में लाने के लिए कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच होड़ मची हुई है। जल्दी ही चंद्रशेखर की राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल से मुलाकात हो सकती है।

दलित कार्यकर्ता चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण ने 2014 में भीम आर्मी संगठन की स्थापना की थी। सहारनपुर के घडकौली गांव में एक बोर्ड लगाने को लेकर हुए जातीय संघर्ष के बाद यह संगठन चर्चा में आया। 2017 में हुए शब्बीरपुर प्रकरण के बाद भीम आर्मी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई। इस हिंसा के मामले में ही रावण को गिरफ्तार किया गया और रासुका लगाई गई। अपने गठन के बाद से अब तक भीम आर्मी 24 राज्यों में सक्रिय हो चुका है और बड़ी संख्या में दलित समाज के युवा इससे जुड़े है। दो अप्रैल को दलितों के भारत बंद में हुई हिंसा के बाद से ही भाजपा में बेचैनी बढ़ी हुई थी। भाजपा के दलित सांसदों ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई थी।

बहराइच की सांसद सावित्री बाई फुले, नगीना के सांसद डॉ. यशवंत सिंह ने खुली बगावत कर दी थी। इसके बाद ही भाजपा ने अपना मन बदला और दलितों को साधने की कोशिश शुरू की। एससी-एसटी एक्ट में संशोधन किया गया। एससी-एसटी एक्ट में संशोधन के बाद चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण के ऊपर लगे रासुका को समाप्त कर रिहा करने का फैसला लिया गया। योगी सरकार ने रावण की मां के प्रार्थना-पत्र के आधार पर रिहा करने का फैसला लिया। भाजपा सरकार का मानना है कि रावण को रिहा करने से वह बसपा सुप्रीमों मायावती के लिए सिरदर्द बनेगा। रावण की भीम आर्मी ने सहारनपुर के साथ ही मेरठ मण्डल और आगरा मण्डल में अपना पैर पसार चुकी है। भाजपा नेताओं का मानना है रावण किसी कीमत पर बसपा सुप्रीमों की अधीनता वह स्वीकार नही करेगा। वह नईपीढ़ी में युवा दलित नेता बन कर पश्चिमी उ.प्र. में बन कर उभरा है।

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