लाल जोड़ा पहन दुल्हन की तरह हुई तैयार, फिर साध्वी बन त्याग दिया सबकुछ, जाने क्यों?

दोस्तों जहाँ एक तरफ हम में से कई लोग सुख, सुविधाएं और भोग विलास की तरफ भागते है और उसे पाने के लिए दिन राह जद्दोजहत करते रहते हैं तो वहीँ दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके पास बहुत पैसा और भोग विलास की साडी चीजें होती है लेकिन फिर भी उन्हें इन सब में ख़ुशी नहीं मिलती हैं और वो अपना सबकुछ त्याग कर वैराग्य की ओर चल पड़ते हैं. आज हम आपको एक ऐसी लड़की से मिलाने जा रहे हैं जिसने मात्र 22 वर्ष की उम्र में ही दुनियां की मोह माया को छोड़ वैराग्य की राह पकड़ ली हैं.
इनसे मिलिए. ये हैं हरियाणा की रहने वाली 22 वर्षीय सिमरन जैन.
सिमरन में ग्रेजुएशन में बीएससी कंप्यूटर साइंस कर रखा हैं. उनके घर में माता पिता के अलावा दो भाई और एक बहन हैं. सिमरन के मात पिता ने सोचा था कि उनकी बेटी पढ़ाई के बाद जॉब करेगी और अपने करियर में आगे बढ़ेगी. लेकिन सिमरन के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था. वो संसार की इस मोह माया तो त्याग दीक्षा लेना चाहती थी. ऐसे में जब उसने अपने माता पिता को इस बारे में बताया तो पहले तो उन्हें आश्चर्य हुआ लेकिन बाद में उन्होंने सिमरन को इसकी इजाजत दे दी. सिमरन के पिता अशोक गौड़ का कहाँ हैं कि हमारे घर की बेटियों को उनकी मर्जी के अनुसार जीवन जीने की अनुमति हैं. इसलिए यदि मेरी बेटी सिमरन दीक्षा लेकर वैराग्य की राह पर जाना चाहती हैं तो मुझे उसमे कोई आपत्ति नहीं हैं.

साध्वी बनने के पहले सजी दुल्हन की तरह

सिमरन को जिस दिन साध्वी लेने की प्रक्रिया से गुजरना था उसके पहले उनके घर वालो ने सिमरन के हाथो में मेहंदी लगाईं. इसके बाद सिमरन ने एक दिन पहले अपने घर वालो के साथ अच्छा समय बिताया. फिर अपनी पसंद का भोजन भी किया. अंत में मुख्य दिन वो दुल्हन की तरह तैयार हुई और फिर अपनी सभी ऐशो आराम की लाइफ को छोड़ इंदौर के बास्केटबॉल कॉम्प्लेक्स दीक्षा लेकर साध्वी श्री गौतमी जी गई.

निकाली गई शाही सवारी

इस प्रक्रिया के दौरान जैन समाज के कई लोग मौजूद थे. इस मौके पर सिमरन की राजवाड़ा के पास सवारी महावीर भवन से शाही सवारी भी निकाली गई. ये शाही सवारी इंदौर के अलग अलग मार्गों से होते हुए बास्केटबॉल कॉम्प्लेक्स पहुंचीं. इस सवारी के दौरान सिमरन को एक बग्घी में बैठाया गया था. इसके बाद उनके साध्वी बनने की प्रक्रिया शुरू हुई, जिसमे केश लोचन सहित दीक्षा की कई विधियां संपन्न हुई. और इस तरह सिमरन साध्वी श्री गौतमी जी गई. अब से सिमरन साध्वी मुक्ताश्री के मार्गदर्शन में वैराग्य की राह पर चलेगी.

इस वजह से बनी साध्वी

साध्वी बनने के बाद से ही सिमरन का अपने संयम को लेकर नया सफ़र शुरू हो गया हैं. दीक्षा लेने के दौरान सिमरन ने अपने साध्वी बनने की वजह भी लोगो के साथ सांझा की. सिमरन ने कहा कि मैं पूरी दुनियां घूम चुकी हूँ. लेकिन मुझे कहीं पर भी सुकून की प्राप्ति नहीं हुई. इसके बाद जब मैं अपने गुरुजनों से मिली तो वहां मुझे असली सुख महसूस हुआ. वैराग्य के मार्ग पर चलना कठिन हैं लेकिन मुझे चकाचौंध वाली लाइफस्टाइल रास नहीं आई. इसलिए मैंने साध्वी बन वैराग्य लेने का निर्णय लिया.
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