व्यंग्य: धारा 377, भाई वाह

जब से धारा 377 की व्याख्या करते हुए, माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला दिया है, हर तरफ बस इसी को लेकर चर्चा हो रही है। हर कोई अपने-अपने ढंग से इस फैसले को लेकर बात कर रहा है। कोई इसे लेकर चिंता जता रहा है, तो कोई खुश है। अब हम तो ठहरे पत्रकार, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिल से सम्मान करते हैं। तभी तो इस फैसले को लेकर ज्यादा कुछ लिखा भी नहीं।

हमारे मोहल्ले में रहते हैं रसिक भइया। नाम की ही तरह रसिया टाइप आदमी हैं। हालांकि पत्नी की चाबुक के आगे इनकी बोलती नहीं निकलती। लेकिन जब से सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है, हमारे रसिक भइया की चिंता बढ़ी हुई है। कई बार इस सवाल को लेकर मुझे घेर चुके हैं, लेकिन हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर मैं उनसे किनारा कर लेता था। लेकिन इस बार रविवार को रसिक भइया सुबह-सुबह हमारे घर आ धमके। आते ही पहला सवाल दागा- ‘धारा 377 के बारे में सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है उस पर कुछ लिखा या नहीं?’ हमने भी बड़ी बेबाकी से कह दिया, ‘नहीं, उसमें क्या लिखना, यह तो माननीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। हम कोई केंद्र सरकार थोड़े हैं जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट देंगे।’ रसिक भइया बोले, ‘अरे यार, मैं फैसला पलटने के लिए थोड़े कह रहा हूं।’ हमने कहा, ‘फिर आप क्या चाहते हैं?’ वह बोले, ‘इस फैसले को लेकर हमारे जेहन में कुछ सवाल उठ रहे हैं। अब समस्या यह है कि इन सवालों को पूछूं किससे? पत्नी से तो इस विषय की चर्चा भी नहीं कर सकता। पता नहीं क्या का क्या अर्थ लगा कर हमारे ऊपर चढ़ाई कर दे और कहीं घर से ही बाहर न कर दे। किसी ऐसे व्यक्ति को मैं जानता नहीं हूं जिसे इस फैसले से राहत मिली हो। तो सोचा तुम पत्रकार हो लाओ तुम्हीं से जानकारी कर लें।’

मैंने भी बिना किसी बहस के उनके सवालों को सुनना ही उचित समझा और कहा, ‘बताइए आपके क्या सवाल हैं?’ उन्होंने कहा पहला सवाल यह है कि धारा 377 के तहत यदि दो पुरुष या दो महिलाएं आपस में विवाह करते हैं तो उनका विवाह किस रीति से संपन्न होगा, हिंदू रीति से या मुस्लिम रीति से या अन्य किसी रीति से?’ उनका सवाल सुनकर मेरा माथा ठनक गया और मैंने उन्हें टोकते हुए कहा, ‘अरे इसमें क्या है, जो जिस धर्म का होगा वह उस धर्म की रीति से विवाह करेगा। नहीं तो लोग कोर्ट मैरिज कर लेंगे।’ मेरी इस बात का जवाब शायद रसिक भइया ने पहले ही सोच रखा था, तभी तो तुरंत बोले, ‘कोर्ट भी तो हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई आदि के रीति-रिवाजों का सम्मान करता है। पहले मेरे सवाल सुन लो।’ मैंने भी लाचारी में कहा, ‘ठीक है भइया पहले आप अपने सवाल पूछ लो फिर मैं जवाब देता हूं।’

इस पर रसिक भइया ने बिना रुके बोलना शुरू किया। बोले, ‘मेरा दूसरा सवाल है कि यदि विवाह हिंदू रीति से होता है तो मांग कौन और किसकी भरेगा और सुहाग की निशानी मंगलसूत्र, पायल और बिछिया आदि कौन धारण करेगा? सवाल संख्या तीन, अगर मुस्लिम रीति से विवाह होता है तो मेहर की रकम कौन चुकाएगा? सवाल संख्या चार, तलाक की स्थिति में तीन बार तलाक, तलाक, तलाक कौन और किससे बोलेगा? सवाल संख्या पांच, बाद में यदि हलाला की स्थिति बनती है तो किसका हलाला होगा और हलाला करेगा कौन? और अब अंतिम सवाल, दोनों में से कौन किसके दरवाजे बारात लेकर जाएगा और उस बारात का स्वागत किसका परिवार करेगा?’

रसिक भइया के सवाल सुनकर मैं हैरान रह गया। मैंने भी ऐसे सवालों की कभी कल्पना तक नहीं की थी। मैं बोला, ‘रसिक भइया, आप भी कहां-कहां से सवाल लेकर आते हो। ये भी कोई सवाल हैं? मैं भला इनके क्या जवाब दूं?’ वह तुरंत बोले, ‘हमें मालूम था कि तुम्हें हमारे सवाल समझ में नहीं आएंगे, लेकिन फिर भी सोचकर आराम से बताना। ये बड़े व्यावहारिक सवाल हैं।’ इसके बाद रसिक भइया पल भर रुके और चाय का एक लंबा घूंट भरते हुए अपना ज्ञान उड़ेलना शुरू किया। बोले, ‘एक बात और बता दें कि अगर पूरे देश के लोग इस तरह के विवाह-बंधन में बंध जाएं तो जनसंख्या वृद्धि पर बहुत ही आसानी से नियंत्रण लग सकता है, जो हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है।’

मैंने पीछा छुड़ाने के लिहाज से कहा, ‘तो रसिक भइया अब आप क्या चाहते हैं?’
उन्होंने तपाक से उत्तर दिया, ‘अरे दुख तो इस बात का है कि पहले हम यह सब जानते ही नहीं थे…।’ मैंने कहा, ‘अगर जानते होते तो क्या कर लेते?’ मेरे इस सवाल पर मन का गुबार उड़ेलते हुए रसिक भइया बोले, ‘अरे करना क्या था, किसी हैंडसम लड़के से शादी करता और ठाट से जिंदगी गुजार रहा होता। इस नकचढ़ी पत्नी और बदतमीज लड़कों से तो बचा रहता, जो हर समय नाक में दम किए रहते हैं। कभी चैन से जीने नहीं देते।’ फिर लंबी सांस खींचते हुए बोले, अच्छा भाई चलता हूं। नहीं तो घर में बीवी कोहराम मचाने लगेगी कि छुट्टी के दिन भी तुमसे घर में नहीं बैठा जाता। चलो मेरे सवालों के जवाब आराम से सोचकर बताना।’ इतना कहते हुए रसिक भइया तेजी से अपने घर निकल लिए और मैं उन सवालों का बोझ लिए अब तक बैठा हंू। समझ नहीं आ रहा कि यह सवाल केवल रसिक भइया के हैं या फिर कई लोग इनपर मंथन कर रहे हैं।

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