व्यंग: घोड़ों की नाराजगी

महाराष्ट्र में घोड़ों की ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के रूप में हुई बदनामी से घोड़ा समुदाय का आक्रोश एक बार फिर से चरम पर पहुंच गया है। इसी आक्रोश के चलते घोड़ा समुदाय ने महाराष्ट्र के घोड़ों के नेतृत्व में घोड़ामंडी में एक बैठक का आयोजन कर डाला। आक्रोश का आलम यह था कि जब घोड़ा समुदाय के पंच मंच पर पहुंचे, तो अचानक हवा में ‘घोड़ों का यह अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान’ जैसे नारों भरी हिनहिनाहट गूंजने लगी।

घोड़ों में गुस्सा इस बात को लेकर था कि हम हजारों साल से मनुष्य की सेवा करते आ रहे हैं, लेकिन मानवीय दुर्गुणों और स्वार्थों का ठीकरा हमारे सिर क्यों फोड़ा जा रहा है? इसी सवाल को लेकर घोड़ामंडी में जबरदस्त शोर था। बैठक में भाग लेने के लिए देश ही नहीं, विदेश से भी अलग-अलग प्रजातियों के घोड़े घोड़ामंडी में पहुंचे थे। बैठक का एजेंडा था घोड़ों को बदनाम करने की साजिश के खिलाफ घोड़ा आंदोलन छेडऩा।

बैठक का संचालन करते हुए एक सीनियर घोड़े ने कहा, ‘देखिए, घोड़ों को बदनाम करने की पूरी साजिश हिंदुस्तानी राजनीति और मीडिया में हो रही है। हमें बिकाऊ-दलाल वगैरह कहा जा रहा है। हमारा किसी थर्ड पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन हमें बेवजह इंसान अपनी घटिया राजनीति में खींच रहे हैं। जो भ्रष्ट है, वह घोड़ा है, कुछ इस तरह की बातें लिखी-दिखाई जा रही हैं। हमें अब विरोध करना ही होगा।’ संचालक घोड़े ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, राजनीति करना और खेलना मनुष्य ने काफी देर से सीखा, लेकिन घोड़े तो इस दुनिया में साढ़े 5 करोड़ साल पहले ही आ गए थे। करीब 5 हजार साल पहले घोड़ों की काबीलियत को भांपकर मनुष्य ने उन्हें पालतू बनाना शुरू किया।

तब से घोड़े मानव सभ्यता की गाड़ी अपने ढंग से खींचते आ रहे हैं। घोड़ों की खूबी यही है कि उनमें जबरदस्त ताकत और दौडऩे का स्टेमिना होता है। घोड़े समझदार और स्वामीभक्त भी होते हैं। शासकों का वाहन होते हुए भी घोड़ों ने खुद कभी सत्ता पाने की हवस नहीं पाली। सौ साल पहले तक घोड़े युद्ध में जरूरी वाहन समझे जाते थे। घुड़सवारी तो आज भी एक कला है। घोड़ों की खासियत है कि उनकी नकेल कसी जा सकती है। बस उनकी लगाम थामे रखने की जरूरत है। लगाम सही हाथों में हो, तो घोड़ा अपने मालिक के इशारों पर चलता है। इतना सब होते हुए भी घोड़ों के साथ हॉर्स ट्रेडिंग जैसा निगेटिव जुमला ऐसा चिपक गया है कि जैसे घोड़े की पीठ पर जीन।’

संचालक की इस बात पर अरबी घोड़े (जिसके बाप-दादा ने पानीपत के द्वितीय युद्ध में हेमू की तरफ से लड़ाई लड़ी थी) को ताव आ गया और वह जोश में भरकर बोला, ‘अच्छा, तो हम उन्हें घर में घुसकर मारते हैं। विधानसभा या लोकसभा पर हमला बोल देते हैं। एक साथ दस हजार घोड़े हमला बोलेंगे, तो नेताओं के तोते उड़ जाएंगे। उन्हें समझ आ जाएगा कि घोड़ों की घोड़ाई अस्मिता से छेड़छाड़ का मतलब क्या होता है।’

अरबी घोड़े का आक्रोश देख एक बुजुर्ग घोड़े ने समझाने की कोशिश की, ‘अरे रुको। लड़ाई से हल नहीं निकलेगा। हमें ऐसी रणनीति बनानी होगी, जिससे नेतागण अपनी राजनीति में घोड़ों को बेवजह खींचना बंद कर दें। उन्हें बिकना हो तो बिकें, लेकिन हमें बख्श दें।’ इस जवाब का बड़ी संख्या में घोड़ों ने समर्थन करते हुए कहा, ‘सही कह रहे हो दादा। नेता और मीडिया दोनों का भरोसा नहीं, कब-कैसे ठिकाने लगा दे। सोच समझकर ही कार्ययोजना बनानी होगी।’

अब बहुत देर से मंच पर बैठा एक बुजुर्ग घोड़ा उठा, जो बैठक की अध्यक्षता भी कर रहा था। उसने कई साल से हिंदुस्तानी राजनीति को देखा-समझा था। माइक संभालते हुए बोला, ‘युवा घोड़ों में गुस्सा है, यह अच्छा है। लेकिन यह ऊर्जा डर्बी दौड़ में दिखाइए। रेसकोर्स में दिखाइए। पोलो के खेल में दिखाइए। सेना में विरोधियों के खिलाफ दिखाइए। नेता और मीडिया के खिलाफ मत दिखाइए।’
‘फिर क्या करें?’ एक घोड़े ने सवाल दागा।
अध्यक्ष घोड़ा बोला, ‘वही, जो विरोध में रेगुलरली किया जाता है। एक खुला खत लिखा जाए। राष्ट्रपति को एक ज्ञापन दे देते हैं। इंटरनेट पर एक सिग्नेचर कैंपेन शुरू करें युवा घोड़े। दिल्ली पहुंचकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया जाए।’
‘बस’? एक घोड़ा बोला।
अध्यक्ष की सीट पर बैठा घोड़ा बोला, ‘हम घोड़े हैं। हमारा चरित्र घोड़े का है। मालिकों के प्रति आस्था के हमारे गुण को इन लोगों ने गाली बनाकर रख दिया है। हॉर्स ट्रेडिंग अब एक गाली है। लेकिन याद रखिए इंसान एक साथ बंदर, कुत्ता, सांप, गिरगिट, घोड़ा, गधा, उल्लू, मगरमच्छ सब हो सकता है। वह किसी भी हद तक गिर सकता है। यदि इंसानों में भी राजनेताओं से पंगा लेने की सोच रहे हो, तो वह तो ऐसी प्रजाति है, जो घोड़े को गधा साबित कर सकती है। नेताओं से पंगा ठीक नहीं।’
‘फिर करें तो क्या करें।’ सोच में डूबा एक युवा घोड़ा बोला।
अध्यक्ष घोड़े ने उपस्थित घोड़ों का गुस्सा शांत करने और बैठक समाप्त करने की गरज से कहा, ‘कुछ नहीं। आप लोग गेटवे ऑफ इंडिया देखिए, सिद्धिविनायक मंदिर के दर्शन कीजिए। तफरीह कीजिए। सेल्फी लीजिए। बाकी-हमारे युवा घोड़े इसलिए खफा हैं कि इन दिनों में महाराष्ट्र में जो कुछ हुआ, उससे घोड़ों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची। यह देश में हर साल-दो साल में चलता रहता है। घोड़ों को भी नेताओं की हरकत का ज्यादा लोड नहीं लेना चाहिए। अब तो देश की जनता, जो उन्हें वोट देकर चुनती है, वह भी उनका ज्यादा लोड नहीं ले रही।’ अपने सबसे सीनियर घोड़े की इस अपील का इतना ज्यादा असर हुआ कि सभी घोड़े खुशी में हिनहिनाते हुए बैठक से बाहर निकल गए।

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