शरिया अदालत को लेकर मुस्लिम संगठनों में मतभेद

Published: 11/07/2018 6:19 PM

नई दिल्ली: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा देश के हर जिले में शरिया अदालत खोलने की तैयारियों को लेकर मुस्लिम संगठनों के बीच मतभेद सामने आने लगे हैं। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जहां इसे देश के संविधान और मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ बता रहा है वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मशावरत का कहना है कि यह कोई नई बात नहीं है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड 15 जुलाई को दिल्ली में एक बैठक करने जा रहा है, जिसमें हर जिले में शरिया अदालत खोलने के प्रस्ताव पर चर्चा होगी। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने इस बैठक का विरोध करने का फैसला किया है। मंच का कहना है कि शरिया अदालतें तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह की कुप्रथा पर से ध्यान हटाने की एक चाल है। इसके खिलाफ मुस्लिम राष्ट्रीय मंच देश भर में आंदोलन चलाकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को बेनकाब करेगा।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का तर्क है कि हर जिले में शरिया अदालत खोले जाने से संपत्ति संबंधी मामले और तलाक के मामलों को निपटाया जा सकेगा। ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मशावरत के महासचिव ए एम नोमानी का कहना है कि शरिया अदालत कहना सरासर गलत है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जिसे शरिया अदालत कह रहा है वह महकमा-ए-शरिया है, जो पंचायत जैसी होती है। नोमानी ने कहा कि यह नया नहीं है, बहुत पहले से देश में इसकी शुरुआत हुई थी। वर्ष 1921-22 में महकमा-ए-शरिया की शुरुआत हुई। जो आज के झारखंड, बिहार और ओडिशा में अब भी काम कर रही है।

नोमानी ने कहा कि 1945 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक बैठक हुई, जिसमें पूरे देश में महकमा-ए-शरिया खोले जाने पर चर्चा हुई किंतु बैठक में शामिल नुमाइंदों के बीच विवाद हो गया और इस पर आगे चर्चा नहीं हो सकी। इसके बाद अलग-अलग मुस्लिम संगठनों ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में इस तरह की पहल की। नोमानी ने कहा कि अभी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तहत 60 महकमा-ए-शरिया (शरिया अदालत) हैं, जिसमें से 16 उत्तर प्रदेश में हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है कि महकमा-ए-शरिया के फैसले को स्वीकार ही किया जाए, जिसे उसका फैसला पसंद नहीं आता वह न्यायालय जाने के लिए स्वतंत्र है।

 

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