शह और मात

गरम खिचड़ी पर एकदम भूखे की तरह टूट पडऩा, मुंह तो जलाएगा ही। राजनीतिक दलों के लिए सत्ता ऐसी मलाई है जिसमें सब्र का कोई कालम ही नहीं बचा है। जलील मानिकपुरी का एक शेर है, ‘सब्र आ जाए इसकी क्या उम्मीद, मैं वही, दिल वही है, तू है वही।’ तो महाराष्ट्र का यह डेंट सीधे अमित शाह और मोदी को लगा है। महाराष्ट्र में वही हुआ, जो होना था। मैं इससे आगे बढ़कर अपनी इच्छा के संदर्भ में कहना चाहूंगा कि वहां वही हुआ, जो होना ही चाहिए था। गोवा, कर्नाटक और मणिपुर वाली काठ की हांडी महाराष्ट्र में भी चढ़ाने को आतुर भाजपा ने लोकतंत्र की तमाम मर्यादाओं को चूल्हे में झोंककर रख दिया।

यह सही है कि मतदाता ने भाजपा और शिवसेना के गठबंधन को बहुमत दिया था। अब जब गठबंधन ही गांठ में तब्दील हो गया, तो क्या वजह रह गई कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में तोड़-फोड़ के शर्मनाक और बचकाने जतन किए गए? तरस तो भाजपा के उन रणनीतिकारों की बुद्धि पर आ रहा है, जिन्होंने महान घाघ राजनेता शरद पवार के मुकाबले उनके भतीजे अजीत पवार पर दांव खेल लिया। अमित शाह को मुगालता लगा कि अब ‘चाणक्य’ का सियासी रूतबा उनके लिए सुरक्षित हो चुका है। फिर वह यह परखने में कैसे चूक गए कि राकांपा में शरद पवार के मुकाबले अजीत की कोई हैसियत है ही नहीं। शरद पवार का रुख तो नरेंद्र मोदी उस दिन ही भांप गए होंगे, जब इन दो नेताओं के बीच किसानों की समस्याओं के नाम पर मुलाकात हुई थी।

चलिए, मान लिया कि शिवसेना की वादाखिलाफी से नाराज देवेंद्र फडऩवीस किसी भी तरह फिर मुख्यमंत्री बनने को व्याकुल हो उठे थे, लेकिन यह कैसे माना जा सकता है कि अजीत तथा शरद के बीच हैसियत के लिहाज से जमीन-आसमान वाला अंतर होने की बात को भाजपा ने पूरी तरह बिसरा दिया था? क्या यह दल कर्म की बजाय किस्मत पर यकीन करने लगा है? क्या उसके कर्ताधर्ता यह मान बैठे थे कि गोवा, कर्नाटक और मणिपुर की तरह ही यहां भी जोड़-तोड़ से काम चल जाएगा? मीडिया में जिस तरह ‘मूर्खता की स्तुति’ का दौर चल रहा है, उसने भी मोदी-शाह की सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित किया है। मैंने कहीं पढ़ा था कि ‘उतावलापन, जल्दबाजी, हड़बड़ी मनुष्य के स्वभाव का एक ऐसा दोष है जो बने हुए काम तो बिगाड़ता ही है, सफलता को असफलता में भी बदल देता है।’ अपने इस पढ़े को आज महाराष्ट्र की राजनीति में घटते हुए भी देख लिया।

भाजपा ने महाराष्ट्र में महाभूल की। इसका पहला नतीजा उसने भुगत लिया। यदि वह सत्ता में आने की कोशिश करने की बजाय शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा की सरकार बन जाने देती, तो उसके लिए आने वाला समय मुफीद हो सकता था। यह सभी जानते हैं कि शिवसेना के कांग्रेस एवं राकांपा से कई मुद्दों पर इतने भारी वैचारिक मतभेद हैं कि किसी न्यूनतम साझा कार्यक्रम से उनका इलाज करना नामुमकिन है। यह सरकार अपने ही अंतॢवरोधों से कमजोर रहती। लेकिन अब ऐसा शायद ही हो पाए। शरद पवार, उद्धव ठाकरे और सोनिया गांधी अपने-अपने विधायकों के बीच, ‘हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के…’ के सदृश महानायक बनकर उन्हें इस आजादी का महत्व समझा चुके हैं।

मुंबई के हयात होटल में 25 नवम्बर को इन तीन दलों के बीच जो एकजुटता दिखी, उसने साफ कर दिया कि टूट की आशंका के चलते सभी विधायक एक-दूसरे को पूरी ताकत से थाम चुके हैं। चलिए, कम से कम यह गनीमत तो रही कि भाजपा ने बहुमत साबित करने का प्रयास नहीं किया। सरकार बनाकर और कदम वापस खींचकर उसकी जो जगहंसाई होना तय थी, वह हो ही गई। उसकी हंसी हर ओर उड़ रही है। सोशल मीडिया पर यह दल ट्रोलर्स के टिड्डी दल का शिकार बन गया है। शिवसेना की ढाई वर्षीय मुख्यमंत्री की मांग के चलते भाजपा को जो सहानुभूति हासिल हुई थी, उसे उसने अपने ही हाथ से खो दिया है।

इससे बहुत बड़ा झटका मोदी-शाह की जोड़ी की अविजित वाली छवि को लगा। उद्धव ठाकरे ने इसलिए ही कहा, अब भाजपा को पता चलेगा कि शिवसेना क्या चीज है। जाहिर है कि उनके तरकश में भी कई ऐसे तीर हैं, जिनका निशाना सिर्फ और सिर्फ कमल की ओर रहेगा। यूं तो नई सरकार के लिए अपार चुनौतियां हैं। राज्य में किसानों का दुख अब आक्रोश में बदल चुका है। जातिगत आधार पर आरक्षण की कुछ समुदायों की अधूरी मांग अब फिर सिर उठाएगी। तीनों दलों के लिए अपने-अपने एजेंडे को साधना भी आसान नहीं रहेगा। लेकिन यह आने वाले कल की बात है। आज की बात तो यह कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह तो बेआबरू हुए ही, जनाब देवेंद्र फडऩवीस भी बड़े बेआबरू होकर मुख्यमंत्री की कुर्सी छोडऩे पर मजबूर हो गए।

प्रकाश भटनागर

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