शिव ‘राज’ है ना!

भोपाल: मध्यप्रदेश में भले ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर से रेडियो हर रोज चीखता है कि अब ‘मजदूर हूं लेकिन मजबूर नहीं, ‘मैं नहीं रहूंगा तो भी शिवराज है ना परिवार की देखभाल के लिए। दो लाख रुपए मिलेंगे।’ लेकिन इन जुमलों की हकीकत को बयान करती है संबल योजना में बाकायदा पंजीकृत एक मजदूर की पत्नी की कहानी। इस मजदूर की मौत के चार महीने बाद भी उसकी पत्नी को दो लाख रुपए की आर्थिक मदद आज तक नहीं मिली है।

जरा उस महिला की स्थिति सोचिए, जिसके पति की मौत हो चुकी है। उसकी चार संतानें हैं। बीमार ससुर की जिम्मेदारी भी उसके सिर पर है। लेकिन वह भटक रही है उस चेक के लिए, जो उसका हक है और जो उसे अब से काफी समय पहले मिल जाना चाहिए था। शिवराज सरकार की कथनी और करनी में फर्क का यह एक साफ उदाहरण है। इसके अलावा ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा देकर केंद्र की सत्ता पर काबिज होने होने वाले एक भाजपाई मंत्री थावरचंद गहलोत का दंभ भी जरा देख लीजिए। 6 अक्टूबर को मध्यप्रदेश के नागदा में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री गहलोत उस समय आगबबूला हो गए, जब इस महिला ने उनसे अनुदान राशि दिलाने की फरियाद करने की खातिर अपनी दुधमुंही बच्ची को मंच पर लिटा दिया।

पीडि़त महिला कह रही थी कि पति की मौत के चार महीने बाद भी उसे मुख्यमंत्री असंगठित मजदूर कामगार कल्याण योजना के तहत चेक नहीं मिल सका है। इस पर गहलोत ऐसे भड़के कि पीडि़ता द्वार बच्ची को वहां लिटाने को उन्होंने दादागिरी की संज्ञा दे डाली। साथ ही दानवीर कर्ण के कलयुगी अवतार की तरह दंभ से भरकर उससे यह भी बोले, ‘दे देंगे चेक।’ यह वही गहलोत हैं, जो जब विधायक थे तो विधानसभा में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव से सीधे भिड़ गए थे।

सुभाष यादव ने तब गरजते हुए कहा था, ‘सहकारिता पंजीयक को हाथ लगाने वाले के दांत तोड़ दूंगा।’ इसके जवाब में गहलोत भी पूरी दमदारी से बोले थे, ‘मेरे पांव की धूल के बराबर भी नहीं हो तुम।’ वही गहलोत आज सत्ता के मद में चूर होकर एक गरीब महिला का अपमान करने से नहीं चूक रहे। इस घटनाक्रम के बाद मध्यप्रदेश के रेडियो पर गूंजने वाले ‘मजदूर हूं, मजबूर नहीं…’ वाले विज्ञापन की पंक्तियां भी बुकलेट जैसी ही प्रतीत हो रही हैं।

यह उस भाजपा का हाल है, जिसे उम्मीद है कि शिवराज की लच्छेदार बातों और योजनाओं के दम पर वह लगातार चौथी बार मध्यप्रदेश में सरकार बनाने में कमयाब हो जाएगी। यह उस व्यक्ति का हाल है, जो संघ से प्रभावित कहा जाता है और जिसके पास वंचितों की मदद की गरज से बनाया गया सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय है। जब ऐन चुनाव के समय भाजपाइयों की अकड़ का यह हाल है तो कल्पना कीजिए यदि लगातार चौथी फतह भी इनके हिस्से आ गई तो फिर गुरूर में डूबे और कितने ऐसे या इससे भी शर्मनाक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।

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