सत्ता पलट के असली किरदार हैं ‘नरेंद्र’, ‘शिवराज’ व ‘नरोत्तम’

कमलनाथ सरकार को गिराने का जो सियासी संग्राम 17 दिन से चल रहा था उसकी अंतिम परिणति सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद 18 घंटे के भीतर शक्ति परीक्षण से पहले कमलनाथ के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने के साथ हुई। कमलनाथ ने इस समूचे घटनाक्रम के वे कारण गिनाये जो उनकी नजर से असली कारण थे। वास्तव में इस सत्ता पलट अभियान के वास्तविक सूत्रधारों में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा शामिल हैं। इसके साथ ही कर्नाटक में ले जाये गये 6 मंत्रियों और 16 विधायकों से किसी भी सूरत में कांग्रेसियों का संपर्क न हो पाये इसकी पुख्ता व्यवस्था करने में भाजपा विधायक अरिवन्द भदौरिया पूरी तरह मुस्तैद रहे। उन्हें इस बात का श्रेय जाता है कि यदि कोई भी विधायक वापस नहीं लौटा तो वह उनकी व्यूहरचना का ही नतीजा था। ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के साथ ही यह साफ हो गया था कि नाथ सरकार की उल्टी गिनती चालू हो गयी। जिन विधायकों ने इस्तीफा दिया उनमें से एक-दो को छोड़कर सभी सिंधिया के भरोसे के थे और जिन पर सिंधिया को पूरा भरोसा था तथा सिंधिया के प्रति उनके मन में अगाध आस्था एवं अंध भक्तिभाव की भावना हिलोरें लेती रही है।

वैसे तो सत्ता पलट के इस खेल में कई अन्य लोगों का सहयोग भी रहा जिनमें केंद्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी.शर्मा, महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव, पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह और रामपाल सिंह शामिल हैं। सिंधिया को यह भरोसा दिलाने में कि उनके भाजपा प्रवेश के बाद ग्वालियर-चम्बल संभाग के किसी भी भाजपा के स्थापित नेता से उनका टकराव नहीं होगा, नरेंद्र सिंह तोमर, डॉ. नरोत्तम मिश्रा और शिवराज सिंह चौहान सफल रहे। इसके साथ ही अंदरखाने चल रही उन चर्चाओं की अंतिम परिणित भी हुई जो सिंधिया को लेकर थी कि वे भाजपा में आ सकते हैं। त्यागपत्र देने वाले सभी विधायकों तथा जो कांग्रेस में हैं उनमें से भी कुछ लोगों ने यह राग अलापना चालू कर दिया कि यह सब पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अहम् की लड़ाई का नतीजा है। फिलहाल तो यही कारण खुले तौर पर बताया जा रहा है कि सिंधिया धीरे-धीरे कांग्रेस की राजनीति में उपेक्षित होते जा रहे थे और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह सत्ता साकेत में कमलनाथ के बाद सबसे शक्तिशाली बन रहे हैं। इस प्रकार की धारणा बनाकर सिंधिया के आत्म सम्मान से जोड़कर देखा जाने लगा, लेकिन यह भी एक हकीकत है कि कमलनाथ और सिंधिया दो चेहरे ऐसे थे जो विधानसभा चुनाव में आगे थे तो संगठनात्मक स्तर पर गुटों व धड़ों में बंटी कांग्रेस को एकजुट करने की असली भूमिका में दिग्विजय सिंह ही थे। हालांकि सरकार बनने में तीनों का ही योगदान था, ऐसे में यदि यह धारणा बन रही थी कि सिंधिया हाशिए पर जा रहे हैं तो उस धारणा को दूर करने के प्रयास न तो कांग्रेस हाईकमान ने किए और न ही प्रदेश स्तर पर कोई पहल हुई।

 

सिंधिया के भाजपा में जाने का कारण केवल उपेक्षा और हाशिए पर जाना एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता, कुछ दिन बाद और भी बातें साफ होंगी। जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ेंगे कई बातें उजागर होंगी। सिंधिया समर्थक जोरशोर से मांग करते रहे कि सिंधिया को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाए, यदि केवल इतनी ही बात होती तो यह काम आसानी से हो जाता लेकिन सिंधिया स्वयं न तो प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते थे और न ही उपमुख्यमंत्री, उनकी चाहत थी कि ये पद तुलसीराम सिलावट को दिए जायें। शायद यही कारण था कि न तो यहां सरकार बनते ही राजस्थान फार्मूला अमल में आ सका और न ही प्रदेश अध्यक्ष की गुत्थी सुलझ पाई। जैसा कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कह रहे हैं कि सिंधिया उनके ऐसे मित्र थे जो उनसे कभी भी मिल सकते थे तो फिर हाईकमान को भी इसकी भनक संभवत: रही होगी कि सिंधिया भाजपा में जा सकते हैं। प्रदेश में जो राजनीतिक माहौल बना उसमें हाईकमान की चुप्पी भी इस बात का संकेत देती है कि उसके मन में कुछ न कुछ संदेह हो। इन सब बातों के बीच जब सिंधिया ने कांग्रेस के वचनपत्र पूरा न करने की स्थिति पर सड़कों पर उतरने की बात कही और जिस तल्खी से मुख्यमंत्री कमलनाथ ने यह कहा कि उतरना है तो उतरें, उसने तेजी से उनके कदमों को भाजपा की ओर बढ़ाने में उत्प्रेरक का काम किया। जिस प्रकार तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारिकाप्रसाद मिश्र की कुछ तल्ख टिप्पणियों ने विजयराजे सिंधिया को आहत किया था और जिसकी परिणति मिश्रा की सरकार गिरने में हुई थी वैसा ही इतने अंतराल के बाद इस समय भी हुआ। दोनों में एक बात समान है कि कांग्रेस को दलबदल के कारण ही अपनी सत्ता दोनों बार गंवाना पड़ी।

 

कमलनाथ ने जहां अपने पन्द्रह महीनों में किए गए जनहितैषी 20 फैसलों का जिक्र किया तो वहीं इतनी ही बार यह भी दोहराया कि भाजपा को यह सब रास नहीं आया। कमलनाथ ने जो कुछ कहा उसका केंद्रीय स्वर यही था कि वे अपने 15 माह के कार्यकाल को भाजपा के 15 साल के शासनकाल से बेहतर मानते हैं। 15 माह बनाम 15 साल का जो नारा उन्होंने उछाला है उसमें उनके आत्मविश्‍वास में कितना दम है यह तो उपचुनावों के नतीजों से ही पता चलेगा कि प्रदेश की जनता को 15 माह और 15 साल में से क्या अधिक पसंद है। कमलनाथ को भरोसा है कि फिर से प्रदेश में कांग्रेस की वापसी होगी और कांग्रेस विधायकों का हौसला बढ़ाने के लिए उन्होंने कहा कि निराश होने की आवश्यकता नहीं, मैंने कई जीतते हुओं को हारते हुए देखा है और मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं कि फिर लौटेंगे और मजबूती से लौटेंगे। उनको यह भी भरोसा है कि गलत तरीके से प्राप्त जीत लम्बे समय तक टिक नहीं पाती। लोकतांत्रिक मूल्यों को परेशान किया जा सकता है खत्म नहीं किया जा सकता।

 

प्रदेश कांग्रेस ने एक ट्वीट करते हुए दावा किया और कहा कि इस ट्वीट को संभाल कर रखना। “पन्द्रह अगस्त 2020 को कमलनाथ मुख्यमंत्री के तौर पर ध्वजारोहण करेंगे और परेड की सलामी लेंगे। यह बेहद अल्प विश्राम है।“ शायद इस भरोसे का आधार है कि कमलनाथ मानते हैं कि एक तथाकथित जनता द्वारा नकारे गये महत्वाकांक्षी, सत्तालोलुप “महाराज“ और उनके द्वारा प्रोत्साहित 22 लोभियों के साथ भाजपा ने जो लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या की है उसकी सच्चाई थोड़े ही समय में सबसे सामने आ जायेगी और जनता इनको कभी माफ नहीं करेगी। प्रदेश में पहली बार एक साथ कम से कम 24 विधानसभा उपचुनाव होना है, उसके बाद ही साफ हो पायेगा कि जनता की नजर में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया में से किसकी राजनीति उसे पसंद आई। इस पर ही यह भी निर्भर करेगा कि यह सत्ता से कांग्रेस का अल्प विश्राम है या 15 माह में हाथ से गई सत्ता अब आसानी से उसके हाथ नहीं लगेगी। जिन सिंधिया समर्थक 6 मंत्री और 16 विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दिया था उन्होने शनिवार को नई दिल्ली में भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली।

 

अरुण पटेल/सुबह सबेरे से साभार

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