सफेद जहर का कहर कहीं आप तो नहीं पी रहे हैं

एक जमाने में जिस देश में दूध-दही की नदियां बहती थीं। यहां तक कि पुराने लोग घर की बहुओं को ‘दूधो नहाओ…’ के आशीर्वाद देते नहीं थकते थे। उसी देश में अब दूध या चाय पीने से डर लगने लगा है। कारण इसमें लगातार बढ़ती मिलावट। केंद्र व राज्य सरकारों की संवेदनहीनता के चलते दूध माफिया के हौसले बुलंद हैं और देश के लगभग सभी राज्यों में धड़ल्ले से मिलावटखोरों की पौ बारह है। पिछले दिनों जहां देश के सबसे बड़े मिल्क ब्रांड में प्लास्टिक मिलने के वीडियो वायरल हुए। इसके अलावा मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा बिकने वाले सांची दूध में डिटरजेंट और यूरिया मिलाने की बात सामने आई है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सांची दूध सहकाी दुग्ध संघों की देन है, जिसमें दूध संघ के अफसर-कर्मचारियों और सप्लायरों का गठजोड़ लोगों को दूध के नाम पर धीमा जहर पिला रहा था। सांची दूध को गाढ़ा करने के नाम पर उसमें सोडियम क्लोराइड की मिलावट की जाती है। यह न केवल जन स्वास्थ्य बल्कि पूरे समाज प्रति गंभीर अपराध है।

अनुमान है कि देश में हर रोज 15 करोड़ लोग मिलावटी दूध पी रहे हैं। यह आंकड़ा इस तरह निकलकर सामने आया है कि देश में 14 करोड़ लीटर दूध का उत्पादन होता है, लेकिन खपत 65 करोड़ लीटर की है। उत्पादन और खपत के बीच करीब 50 करोड़ लीटर के इस बड़े अंतर से सवाल उठता है कि मांग कैसे पूरी होती है। तो इसका जवाब है मिलावट खोरी। एफएसएसएआई द्वारा किए गए ‘राष्ट्रीय दुग्ध गुणवत्ता सर्वे’ से मिलावट की बात सामने आई है। सर्वे में साफ हुआ है कि दूध में वनस्पति तेल, डिटर्जेंट, ग्लूकोज, यूरिया और अमोनियम सल्फेट मिलाया जाता है। दूध के नमूनों में एंटीबायोटिक अवशेष, कीटनाशक अवशेष और एफ्लैटॉक्सिन एम-1 की मिलावट की भी जांच की गई। सर्वे में यह तथ्य भी सामने आया कि दूध में वसा (फैट) और ठोस गैर वसा (एसएनएफ) मानक के अनुरूप नहीं होते हैंं।

दूध में मिलावट पर सुप्रीम कोर्ट भी कई बार चिंता जता चुका है, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें इस ओर से आंखें मूंदें हैं। कारण यह कि कई बड़े नेताओं का दुग्ध व्यवसाय मुख्य बिजनेस रहा है। इसीलिए जब भी सुप्रीम कोर्ट कोई नोटिस जारी करती है, तो केंद्र सरकार यह कहकर पल्ला झाड़ लेती है कि दूध की ‘सफेदी’ बरकरार रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, उसकी नहीं। दूध की गंगा बहाने वाले हमारे देश को मिलावटखोरों की नजर लग गई है। दूध व्यापारियों और मिलावटखोरों की सरकार द्वारा की जा रही अनदेखी, खाद्य सुरक्षा से जुड़े विभागों में रिश्वतखोरी के साथ दूध की लगातार बढ़ती मांग और आपूर्ति के बीच भारी अंतर का ही नतीजा है कि अमृततुल्य यह पदार्थ मिलावटखोरी की भेंट चढ़ गया है। निजी डेयरी एवं खुला दूध बेचने वालों द्वारा की जाने वाली मिलावटखोरी की बात छोड़ दीजिए, सहकारी डेयरियां व मिल्क प्लांट तक के दूध के जो नमूने अब तक जांचे गए हैं उनमें भी रासायन या सिंथेटिक पाए गए हैं।

हालांकि दूध में मिलावटखोरी का सबसे सस्ता और आसान उपाय इसमें पानी की मिलावट करने का है। ऐसा नहीं है कि पानी की मिलावट करने से दूध केवल पतला हो जाता है, बल्कि इससे दूध की पौष्टिकता और इनमें पाए जाने वाले विटामिन, प्रोटीन आदि की मात्रा में भी कमी आ जाती है। इसके अलावा दूध में मिलाया जाने वाला पानी कितना शुद्ध और कीटाणुरहित है, यह भी हमारे स्वास्थ्य पर असर डालता है। इसके अलावा नकली दूध बनाने के लिए यूरिया, कास्टिक सोडा, रिफाइंड, डिटर्जेंट पाउउर तथा सफेद रंग के पेंट का प्रयोग किया जाता है। ऐसा दूध तो पीने वाले के लिए जहर का काम करता है। यही वजह है कि इस तरह का दूध पीने से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है।

दूध में मिलावटखोरी और जहरीला दूध बनाने का सिलसिला पिछले कुछ वर्षों से समूचे देश में काफी तेजी फला-फूला है। यह जहरीला दूध न केवल घरों सप्लाई किया जा रहा है, बल्कि दुकानों, डेयरी, मिल्क प्लांट, चाय की दुकानों, रेस्टोरेंट के साथ करीब समूचे देश में रेलवे स्टेशन के चायखानों में धड़ल्ले से बेचा जा रहा है।

सरकार-प्रशासन नहीं गंभीर : नकली दूध पर अंकुश लगाने के प्रति सरकार और प्रशासन ही गंभीर नहीं है। त्योहारों के समय जब दूध तथा पनीर, खोया और दूध से बनने वाली मिठाइयों की मांग जोर पकड़ती है, तो मिलावटी व जहरीला दूध पकड़े जाने की खबरें सुनाई देती हैं। टैंकरों पकड़ा जाने वाला मिलावटी दूध नालियों में बहा दिया जाता है। यही नहीं, नकली मावा और पनीर के भंडार भी पकड़े जाते हैं। लेकिन, इस तरह की कार्रवाई केवल त्योहारों तक ही सीमित रहती है। अधिकारी भी इस तरह के दूध, पनीर व मावा को जांच के लिए भेजकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। त्योहार बीतते ही सरकारी अफसर अपनी दुनिया में मस्त हो जाते हैं और मिलावटी दूध का कारोबार करने वालों की पौ बारह रहती है। मिलावटखोरों का यह सिलसिला पूरे वर्ष लगातार जारी रहता है। दरअसल, मिलावट के इस धंधे में मोटे मुनाफे के साथ कड़ी सजा न होने से भी मिलावटखोरों के हौसले बुलंद रहते हैं।

दरअसल, भारत में मिलावटखोरी, सिंथेटिक दूध या अन्य मिलावटी व नकली खाद्य सामग्री बेचने या बनाने के खिलाफ किसी कड़ी सजा का प्रावधान नहीं है। जबकि यह धंधा सुनियोजित ढंग से तथा अकूत पैसा कमाने के लिए किया जाने वाला ऐसा अपराध है, जिससे आम आदमी की जान तक चली जाती है या फिर गंभीर बीमारी का शिकार होने पर उसकी जिंदगी नरक हो जाती है। मिलावट के खिलाफ कड़े कानून न होने के कारण आरोपी के विरुद्ध हल्की धाराओं में मामला दर्ज कर कोर्ट में केस पेश किया जाता है, जिससे आसानी से जमानत मिल जाती है, साथ ही बहुत जल्द बरी भी हो जाता है।

चीन से लें सबक : चीन में दूध में मिलावटखोरी का अपराध करने वालों के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। कुछ वर्ष पूर्व वहां दूध में मिलावट करने के दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था। अपराध साबित होते ही दोनों दोषियों को फांसी पर लटका दिया गया। यही वजह है कि उसके बाद आज तक चीन में मिलावटखोरी की दूसरी घटना सुनाई नहीं पड़ी।

बड़े शहरों का हाल

यूपी की राजधानी तक में मिलावटखोरों के हौसले बुलंद हैं। कई बार यहां लिए गए नमूने जांच में फेल हो चुके हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, शहर में सप्लाई किया जा रहा करीब 6 फीसदी दूध मिलावटी है। कमोबेश यही हाल कानपुर और वाराणसी का भी है।

मथुरा : भगवान कृष्ण की नगरी, जिसे दूध की खान भी कहा जा सकता है, वहां भी मिलावटी दूध का कारोबार चरम पर है। यहां से लिए गए सैंपल कई बार फेल हो चुके हैं।

गाजियाबाद : यहां प्रतिदिन दस लाख लीटर से ज्यादा दूध सप्लाई किया जाता है। पिछले एक साल में करीब 10 सैंपल लिए गए, जिसमें से एक चौथाई में मिलावट पाई गई।

नोएडा : पिछले वर्ष दूध के 13 सैंपल लिए गए, जिसमें से 18 की रिपोर्ट निगेटिव आई। इनमें से तीन मामलों में तो दूध में जानलेवा रसायनों की मिलावट की बात सामने आई है।

ऐसे बनता है नकली दूध

अलग-अलग शहरों से लिए गए दूध के नमूनों की जांच में यह बात सामने आई कि नकली दूध बनाने के लिए शैंपू, यूरिया, साबुन और स्टार्च आदि का इस्तेमाल किया जाता है। 10 लीटर नकली दूध तैयार करने में एक किलो शैंपू, पांच किलो असली दूध, खाने का सोडा, इलायची, सिंघाड़े का आटा, रिफाइंड तेल, ग्लूकोज आदि का इस्तेमाल किया जाता है।

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