सवर्ण आरक्षण बिल पर सरकार का झूठ सामने आया

दिल्ली ब्यूरो: क्या सवर्ण आरक्षण बिल को लेकर मोदी सरकार ने गलत तथ्यों का हवाला दिया या फिर झूठ बोला। राज्यसभा में 124वां संविधान संशोधन विधेयक 9 जनवरी को पास किया गया है। बिल के पेश होने से पहले केन्द्र सरकार ने कहा था कि सिन्हो कमीशन ने आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने का सुझाव दिया है। बता दें कि यूपीए के शासनकाल में मेजर जनरल एसआर सिन्हो की अध्यक्षता में तीन सदस्यों वाले कमीशन का गठन किया गया था।

कमीशन ने जुलाई 2010 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, “ कमीशन संवैधानिक और कानूनी पक्ष के आधार पर मानता है कि पिछड़े वर्ग को रोजगार और शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण प्रदान नहीं किया जा सकता है। सरकार केवल कल्याणकारी योजनाओं के लिए ही आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को चिन्हित कर सकती है। सिन्हो कमीशन की रिपोर्ट में आगे यह भी कहा गया है कि आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को आरक्षण देने के लिए दो महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार करना आवश्यक है।

पहला, आर्थिक पिछड़ेपन के साथ सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ापन जरूरी है। दूसरा, आरक्षण में 50 फीसदी के कोटे से ऊपर जाने के लिए संविधान संशोधन या सुप्रीम कोर्ट की ओर से अनुमति जरूरी होगी। अंतिम वाक्य में इसे दोहराया गया है – “भारतीय संदर्भ में आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए एक सकारात्मक कदम है।” कमीशन ने सामान्य वर्ग के आर्थिक कमजोर 5.85 करोड़ लोगों के लिए 10,000 करोड़ रुपये राहत पैकेज जारी करने का सुझाव दिया था।

लेकिन सामान्य वर्ग के गरीबों को आरक्षण के लिए केन्द्र सरकार सिन्हो कमीशन के सुझावों का हवाला देती रही है। जबकि सच यह है कि कमीशन की रिपोर्ट में गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की बात तो है लेकिन आरक्षण की कोई चर्चा नहीं है।

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