सिंधिया की राह हुई आसान तो तोमर को मजबूत कर रहीं बहनजी

गुना लोकसभा सीट पर सिंधिया राजपरिवार की मजबूत पकड़ के चलते इस सीट से लोकसभा पहुंचने की राह ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए हमेशा आसान रही है। भाजपा ने कांटे बिछाने की हमेशा कोशिशें कीं लेकिन उसे सफलता नहीं मिली क्योंकि इस क्षेत्र में सिंधिया का अपना स्वयं का एक आभामंडल है जो उनकी स्थिति को मजबूत बनाये रखता है। मुरैना लोकसभा सीट पर भाजपा की प्रतिष्ठा इस मायने में दांव पर लगी है क्योंकि वहां से उसके उम्मीदवार नरेंद्र सिंह तोमर पार्टी के एक बड़े नेता हैं, मोदी मंत्रिमंडल में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिली हुई हैं, वे भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं तथा दो बार वे मध्यप्रदेश में भाजपा के अध्यक्ष रहने के साथ ही उमा भारती, बाबूलाल गौर और शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रह चुके हैं। जब ग्वालियर से तोमर मुरैना आये थे उस समय ऐसा लग रहा था कि इस बार उनकी राह में कई कांटे बिछे हुए हैं लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती ने गुर्जर समाज के करतार सिंह भडाना को उम्मीदवार बनाकर और उसके बाद अपने प्रत्याशी के समर्थन में रैली कर तोमर का लोकसभा में जाने का रास्ता आसान कर दिया है क्योंकि गुर्जर समाज के जितने वोट वो काटेंगे उतना तोमर की राह आसान हो जायेगी। तोमर को भाजपा के परम्परागत गुर्जर मत तो सीधे मिल जायेंगे और बाकी कांग्रेस के मतों में भडाना कितनी सेंध लगा पाते हैं यह चुनाव नतीजों से ही पता चलेगा। बसपा ने पहले डॉ. रामलखन सिंह को अपना उम्मीदवार घोषित किया था जो ठाकुर थे लेकिन बाद में उनके स्थान पर उनकी सहमति से भडाना को उम्मीदवार घोषित किया गया। रामलखन यदि मैदान में होते तो वे भाजपा के मतों में सेंध लगाते।

गुना में 13 उम्मीदवारों के बीच सीधी टक्कर कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया और भाजपा के कृष्णपाल सिंह (डॉ. के.पी.यादव) के बीच हो रही है क्योंकि बहुजन समाज पार्टी के धाकड़ लोकेंद्र सिंह राजपूत ने चुनाव प्रचार के दौरान स्वयं मैदान से हटने की घोषणा करते हुए सिंधिया के समक्ष कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली जिसके चलते बसपा सुप्रीमो मायावती इतनी अधिक नाराज हो गयीं कि उन्होंने बसपा चुनाव चिन्ह पर पूरी ताकत से चुनाव लड़ने का ऐलान करते हुए कमलनाथ सरकार से पार्टी के समर्थन देने के मुद्दे पर पुनर्विचार करने तक की बात कह दी।

हालांकि इसे औपचारिकता ही माना जा रहा है क्योंकि उम्मीदवार के मैदान से हटने का सीधा-सीधा फायदा कांग्रेस व सिंधिया को मिलता दिख रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में हालांकि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन गयी लेकिन गुना लोकसभा क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवारों को कांग्रेस उम्मीदवारों से 16 हजार 499 वोटों की बढ़त मिली है और इस क्षेत्र के आठ विधानसभा क्षेत्रों में से पांच पर कांग्रेस और तीन पर भाजपा काबिज है, सिंधिया की बुआ यशोधराराजे सिंधिया भी भाजपा विधायकों में शामिल हैं। वैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अनेक बार मतदाताओं से सीधे पूछ चुके हैं कि आखिर उनकी सेवा में ऐसी क्या कमी है कि गुना विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस नहीं जीत पाती। हालांकि भाजपा की जो बढ़त है वह सिंधिया के आभामंडल को देखते हुए इतनी बड़ी नहीं है जिसे वे पाट न सकें। जब वे स्वयं मैदान में होते हैं तब स्थिति कुछ और होती है, 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते प्रदेश में कांग्रेस ने जो दो सीटें जीती थीं उनमें एक गुना भी शामिल थी और सिंधिया ने यह चुनाव भाजपा के जयभान सिंह पवैया को 1 लाख 20 हजार 792 मतों के अन्तर से हरा कर जीता था।

जहां तक मुरैना का सवाल है यहां 25 कोणीय मुकाबले में असली चुनावी घमासान भाजपा के नरेंद्र सिंह तोमर, कांग्रेस के रामनिवास रावत और बहुजन समाज पार्टी के करतार सिंह भडाना के बीच हो रहा है। इस क्षेत्र में बसपा का भी अपना असर रहा है और वह इस चुनाव में क्या गुल खिलाती है इस पर भी चुनाव नतीजे निर्भर करेंगे। मुरैना लोकसभा क्षेत्र 2009 से सामान्य वर्ग के लिए हो गया है और 2009 में नरेंद्र सिंह तोमर ने यह सीट जीती थी तो 2014 में अटलबिहारी वाजपेयी के भांजे अनुप मिश्रा यहां से चुनाव जीते। यदि 2018 के विधानसभा चुनाव को देखा जाए तो मुरैना लोकसभा सीट भाजपा के लिए आसान नहीं है क्योंकि आठ में से सात विधायक कांग्रेस और एक भाजपा का है। भाजपा का जो एकमात्र विधायक सीताराम आदिवासी जीता उसने कांग्रेस के कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष एवं विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के मुख्य सचेतक रामनिवास रावत को 2840 मतों के अन्तर से पराजित किया था, वही रावत अब कांग्रेस उम्मीदवार के रुप में तोमर एवं भडाना से दो-दो हाथ करने की कोशिश कर रहे हैं।

सुबह सबेरे से साभार

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