”सियासत के लिए हिरासत जरुरी” ताकि प्रियंका की राजनीति को नाथा जा सके

अखिलेश अखिल

सियासत के लिए हिरासत जरुरी है ताकि आगामी चुनाव में कांग्रेस की राजनीति को नाथा जा सके। खासकर प्रियंका के आकर्षण को धूमिल किया जा सके। बीजेपी के भीतर अभी यही मंथन जारी है। बहस इस बात को लेकर चल रही है कि दामाद को हिरासत मिल जाय तो बीजेपी की नैया पार हो जाय। एक तो गठबंधन की राजनीति से पहले ही बीजेपी परेशान हो गई थी और अब प्रियंका की यूपी में पहुंचना बीजेपी को कुछ ज्यादा ही दंश दे रहा है। लखनऊ से भागे -भागे नेता कार्यकर्ता दिल्ली बीजेपी कार्यालय पहुँच रहे हैं और प्रियंका के प्रति जनता के मोह की कहानी बता रहे हैं। कहानी बन रही है कि प्रियंका का कोई तोड़ नहीं निकाला गया तो सब चौपट हो जाएंगे। तोड़ क्या हो सकता है ? एक नेता ने यूपी के कार्यकर्ता से सवाल खड़ा किया। जबाब मिला ”दामाद की हिरासत। अगर ऐसा हो गया तो कुछ मामला बन जाएगा। गठबंधन से हमनीपात लेंगे। ”

इसमें अब कोई शक नहीं कि प्रियंका के पति वाड्रा को हिरासत में ले लिया जाय। भले ही दिखाने के लिए ही सही। सांकेतिक हिरासत ही सही। बीजेपी को लग रहा है कि इसका बड़ा सन्देश जनता में जाएगा और बीजेपी यह प्रमाणित करने की कोशिस करेगी कि कांग्रेस के डम्पर ही दामाद ने घोटाला किया। इस घोटाले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी शरीक हैं। बता दें कि सोनिया गांधी और राहुल गाँधी पर पहले से ही नेशनल हेराल्ड मामला का केस चल रहा है अब वाड्रा को हिरासत में लेकर प्रियंका की राजनीति पर सवाल उठाये जा सकते हैं। कांग्रेस भी बीजेपी के इस खेल को समझ रही है। राहुल गांधी को इसका अंदाजा लग सा गया है तभी पिछले दिनों राहुलगांधी ने बयान दिया कि वाड्रा, चिदंबरम की जांच कराइये, पर राफेल पर जवाब दीजिए।

लेकिन कांग्रेस भी तो कम घाघ नहीं। इस बार वह अपनी कमजोरी को हथियार बना रही है। इतिहास के पन्ने को पलट रही है और पिछले दामाद की कहानी सामने ला रही है। अटल के दामाद रंजन भट्टाचार्य की कहानी को बीजेपी भी श्रृंखलाबद्ध कर रही है। एक दामाद की काट दूसरे दामाद के खेल से ही संभव है।लेकिन तस्वीर पर पहले नजर डालें। लंदन में 2005 से 2010 के बीच किसी और की खरीदी प्रॉपर्टी पर वाड्रा को ऐन चुनाव के समय चिपकाया जा रहा है। सवाल, जांच एजेंसियों पर भी है कि 2014 से मोदी सरकार सत्ता में थी, तो ईडी के अफसर क्या भांग खाकर सोये हुए थे कि उन्हें मनी लॉन्डरिंग का पता नहीं चला? एफआईआर नहीं, अदालत की अनुमति नहीं, मगर वाड्रा के ई-मेल तक पहुंच के लिए सरकारी हैकरों की मदद ली गई। बीजेपी वाले कहते हैं कि सब समय पर ही होता है। अब मौक़ा है खेल जारी है। बीजेपी के एक नेता से रंजन भट्टाचार्य की कहानी पूछी गई और उसके खेल के बारे में जब कहा गया तो जबाब मिला ”यह तब की बात थी। फिर मनमोहन सरकार ने कार्रवाई क्यों नहीं की ? फिर अब तो अटल जी भी नहीं रहे। जबाब कौन देगा ? और मोदी जी को इससे कोई मतलब भी नहीं। मोदी जी को तो कोई दामाद ही नहीं है। ”

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अब सवाल है कि क्या मोदी भक्त दोनों दामादो के खेल पर कोई टिप्पणी करेंगे ? सवाल ही नहीं उठता। अटल के दामाद पर भक्त जन बगले झाँकने लगते हैं। और जनता तो बेचारी है। उसे भला रंजन कीकहानी कब तक और कितनी याद रहे ? सच तो यही है कि रंजन भट्टाचार्य और वाड्रा के खेल पर चर्चा कराई जाए तो अटल के दामाद की करतूत सोनिया के दामाद पर भारी पड़ेगी। 1996 से पहले देश में रंजन किशोर भट्टाचार्य को ठीक से कोई जानता तक नहीं था। दिल्ली के श्रीराम कॉलेज से कामर्स ग्रेजुएट रंजन भट्टाचार्य, 1979 में श्रीनगर के ओबेराय होटल को ज्वाइन किया, कुछेक वर्षों में जनरल मैनेजर बन गये। 1987 में रंजन भट्टाचार्य मुलाजिम से आंटेप्रिन्यिोर बन चुका था। आर्किड रिसॉर्ट प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी के बैनर तले मनाली में फोर स्टार होटल का निर्माण कराया। पांच साल बाद, उस प्रॉपर्टी को कांपीटेंट मोटर्स दिल्ली को रंजन भट्टाचार्य ने बेच दी।

वाजपेयी जी 1996 में जब पहली बार प्रधानमंत्री बने, रंजन भट्टाचार्य को पीएमओ में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी बनाकर ले आये। यह ठीक उसी बेशर्मी से हुआ, जैसे ट्रंप ने अपने दामाद को व्हाइट हाउस में सलाहकार बना रखा है। रंजन भट्टाचार्य ने 1997 में ‘टेलेंट मार्केटिंग’ नामक कंपनी सेटअप की, जिसका काम अमेरिका स्थित होटल चेन ‘कार्लसन रेजीडोर’ की दुनियाभर में रिजर्वेशन सेवा प्रदान करना था। इस ग्रुप का ग्लोबल टर्न ओवर 31.4 अरब डॉलर सालाना था। 19 मार्च 1998 को अटल जी दोबारा से पीएम बने। देखते-देखते रंजन भट्टाचार्य के सर्किल में हयात रिजेंसी के मालिक शिव जाटिया, रैडीसन के मालिक राजीव त्यागी, होटल व्यवसायी ललित सूरी, उद्योगपति नुस्ली वाडिया, देश के मीडिया मुगल, सत्ता के दलाल शरीक हो गये।

अटल शासन पार्ट टू के प्रारंभिक दौर में पीएमओ में ओएसडी शक्ति सिन्हा को वाशिंगटन वर्ल्ड बैंक के वास्ते चलता किया गया, और उनकी जगह रंजन भट्टाचार्य की तैनाती हुई। पीएमओ में दो सत्ता केंद्र थे। एक प्रिंसिपल सेक्रेट्री ब्रजेश मिश्रा, और दूसरा रंजन भट्टाचार्य। इस पांच साल की अवधि में रंजन भट्टाचार्य ने कितनी प्रापर्टी बनाई, यह कभी आयकर, इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट के लिए शोध का विषय नहीं रहा है। मनमोहन सिंह की सरकार भी इससे आंख मूंदती रही। शायद, उसकी वजह ये भी रही हो, तू मेरे दामाद पर चुप रहो, मैं तेरे दामाद पर। मोदी दामाद वाले हैं नहीं, इसलिए एकतरफा दंगल छेड़ दिया। कोई रंजन भट्टाचार्य का मुद्दा उठाता है, तो उठाया करे, मोदी को इससे क्या फर्क पड़ना है?

मोदी को फर्क पड़ना है, तो राफेल पर। पचपन महीने में जो कुछ किया, उसे फील्ड में कोई जाकर क्रास चेक करे, उससे मोदी सरकार को फर्क पड़ता है। पहली बार प्रतिपक्ष का कोई नेता राफेल जैसे विषय से इतना चिपका है। इन्हें लगा था, तीन तलाक का घमासान छेड़ेंगे, राफेल राग गायब हो जाएगा। राजदार मिशेल का भौकाल खड़ा करेंगे, तो ये शांत बैठ जाएंगे। नेशनल हेरॉल्ड के बेल को बार-बार याद दिलायेंगे, खामोश हो जाएंगे। मगर, ये सब हो नहीं पा रहा है। उल्टा, सीबीआई-ईडी की समवेत कार्रवाई पर विपक्ष लामबंद हो रहा है। लालू प्रसाद, चंद्रबाबू नायडू, ममता, मायावती, अखिलेश, केजरीवाल इन तमाम ‘महामिलावटी’ नेताओं को एक मंच पर लाने, और उन्हें मजबूत करने में मोदी-शाह-जेटली त्रिमूर्ति का निरंतर प्रहार बड़ी वजह है।

सच यह है कि 2019 की लड़ाई,’करो या मरो’ की दिशा में जा रही है। शब्दवाण तीखे हो रहे हैं। ‘चौकीदार चोर है’ के बरक्स ‘उल्टा चोर चौकीदार को डांट’, ‘चिटफंडिये लुटेरा, और उसके संरक्षक को छोड़ा नहीं जाएगा,’ दलालों-बिचौलियों को बचाने का प्रयास मोदी सफल नहीं होने नहीं देगा।’ ये सब समकालीन भारतीय राजनीति की नई शब्दावली है। दो सांड़ों की लड़ाई में यूपीए-एनडीए के छोटे-छोटे घटक दल तीतर-बटेर, कछुए, खरगोश जैसे दिख रहे हैं।

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