सिस्टम ने मारा महाकवि को?

‘जब तक मेरी यश भारती पुरस्कार की पेंशन बहाल नहीं हो जाती, तब तक इस दुनिया से नहीं जाने वाला’ कहने वाले 93 साल के वयोवृद्ध गीतकार गोपालदास ‘नीरज’ अपनी यह आखिरी इच्छा साथ लिए ही इस दुनिया से चले गए। यश भारती की रुकी पेंशन की नीरज जी को कितनी दरकार थी और यूपी का सरकारी सिस्टम कितना नकारा, इसे बयां करती एक रिपोर्ट।

‘जियते न करैं राधा, मरे करैं सराधा’ गांव की यह लोकोक्ति फिलहाल उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर पूरी तरह से फिट बैठती है। योगी सरकार 15 महीने से प्रख्यात कवि-गीतकार गोपालदास ‘नीरज’ की पेंशन पर कुंडली मारे बैठी रही। नीरज जी पाई-पाई के मोहताज होकर गुरबा की जिंदगी जीने को विवश होते रहे। और आज जब वह इस दुनिया में नहीं हैं, तो योगी सरकार उनके नाम पर उनकी स्मृति में पांच नवोदित कवियों को एक-एक लाख का ईनाम देने जा रही है। ‘जब तक मेरी यश भारती की पेंशन बहाल नहीं हो जाती, तब तक इस दुनिया से नहीं जाने वाला।’ अस्पताल के बेड पर लेटे-लेटे हुए यह बात हर मिलने आने वाले लोगों से कहने वाले गोपालदास ‘नीरज’ की यूं तो आखिरी ख्वाहिश मंच पर कविता पाठ करते मौत पाने की थी, लेकिन 93 साल की उम्र में नीरज इस कदर टूट गए थे कि उन्होंने जीने का इरादा ही छोड़ दिया था और मौत से महज आठ दिन पहले डीएम को खत लिखकर इच्छामृत्यु भी मांग ली थी।

दरअसल, बात 27 जून की है, 19 जुलाई को गोपालदास ‘नीरज’ के निधन से मात्र 22 दिन पहले की। बुरी तरह से स्वास्थ्य खराब होने के चलते अलीगढ़ के जनकपुरी स्थित अपने घर पर बिस्तर से बिना सहारे उठ भी ना पाने वाले नीरज जी अचानक लखनऊ जाने की जिद करने लगते हैं। उनकी जिद के आगे घरवालों की भी एक नहीं चली और नीरज जी को लेकर लखनऊ आ गए। 93 साल के वयोवृद्ध गीतकार, जिनके हाथ-पैर सही से काम न कर रहे हों, जो दिल में इच्छामृत्यु की चाहत रखते हों, जिन्हें घर के एक कमरे से दूसरे कमरे तक जाने में भी असहनीय वेदना होती हो, वह नीरज जी 350 किलोमीटर दूर लखनऊ, वह भी जून की चिलचिलाती गर्मी में, अगर जाने को तैयार हुए, तो आसानी से महसूस किया जा सकता है कि क्या दर्द रहा होगा, क्या मजबूरी रही होगी?

उन्हें यश भारती की पेंशन के रूप में मिलने वाले 50 हजार रुपए की कितनी जरूरत रही होगी? दरअसल गीतों और कविताओं की रॉयल्टी से नीरज जी को इतना पैसा नहीं मिल पाता था, जिससे वह अपना समुचित इलाज कराने के साथ अन्य खर्च चला सकें। पेंशन रुकने पर खुद नीरज जी कई दफा यह बात सार्वजनिक रूप से कह चुके थे कि इलाज पर बढ़ता खर्च उठाने का अब बूता नहीं है। बहरहाल, लखनऊ पहुंचकर 27 जून को ही गोपालदास ‘नीरज’ ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके 5-कालीदास मार्ग आवास पर मुलाकात की। इसके अलावा संगठन के सबसे ताकतवरों में शुमार प्रदेश संगठन मंत्री सुनील बंसल से भी उन्होंने गुहार लगाई। लेकिन सरकार और संगठन के शीर्ष व्यक्तियों से मुलाकात के बाद भी नीरज जी जब अलीगढ़ लौटे, तो एक बार फिर साथ ले गए सिर्फ आश्वासन।

इसके पहले भी नीरज जी तीन बार पत्र लिखकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपनी रुकी हुई पेंशन रिलीज कराने की गुहार लगा चुके थे। दरअसल, नीरज जी को आखिरी बार मार्च 2017 में पेंशन मिली थी। यूपी में विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद 19 मार्च को मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली योगी आदित्यनाथ ने। और इसी के साथ उन्होंने पहला काम किया जांच के नाम पर नीरज जी की पेंशन रोकने का। हालांकि अखिलेश यादव की सरकार में रेवड़ी की तरह अपात्रों को पुरस्कार बांटने को लेकर शुरू हुई जांच के सवाल पर नीरज जी कहते थे, ‘मैं पद्मभूषण और पद्मश्री से सम्मानित कवि हूं, मेरे मामले में सरकार को क्या जांच करनी है? यदि जांच करनी भी है तो जल्दी करे, इतने महीने से जांच ही तो चल रही है।’

दरअसल, स्वभाव से सज्जन और राजनीतिक तीन-पांच में नहीं रहने वाले कवि नीरज को यह भान ही नहीं था कि सरकारी सिस्टम की चक्की बहुत ‘समाजवादी’ होती है। उसे राष्ट्रपति से पद्मभूषण और पद्मश्री से विभूषित कलाकार और चारणगीत गाकर ‘यश भारती’ झटक लेने वाले चंद लोगों के बीच कोई फर्क करना ही नहीं आता। बहरहाल, यह एक झलक है, सर्कस बने सरकारी सिस्टम, राजनीतिक पार्टियों की आपसी वैमनश्यता और नौकरशाही की उस संवेदनहीनता की, जो जिंदा लोगों की समय रहते मदद नहीं करता, बल्कि मरने वालों को मुआवजा बांटने में यकीन रखता है।

उधर, स्वभाव से कवि नीरज जी को सरकार और सिस्टम पर पूरा भरोसा था। उन्हें पूरी उम्मीद थी कि जल्द ही उनकी 15 महीने से रुकी यश भारती की पेंशन फिर से शुरू होगी। और यह भरोसा हो भी क्यों ना, जब मुख्यमंत्री ही आमने-सामने की मुलाकात में नीरज जी को यह आश्वासन दे चुके थे। मगर यह भरोसा नहीं, सिर्फ एक भ्रम था जो उन्हें अंतिम सांस तक रहा। पेंशन की आस कलेजे में दफन किए आखिर नीरज जी 19 जुलाई को हमेशा के लिए दुनिया छोड़ गए।

अब सिस्टम का तमाशा देखिए। अपनी लेखनी से महाकवि का खिताब पाने वाले उत्तर प्रदेश की माटी की इस पैदाइश की जीते जी यूपी सरकार ने कद्र नहीं की। और जब नीरज जी दुनिया को अलविदा कर गए, तब उनके नाम पर हर साल पांच नवोदित साहित्यकारों को पुरस्कार देने की घोषणा कर दी। इतना ही नहीं, योगी सरकार ने आनन-फानन में नीरज जी के निधन के बाद बदनामी की डर से यश भारती पेंशन पर लगी रोक भी हटा ली, जो जांच के नाम पर करीब सवा साल से बंद थी। अपनी फजीहत बचाने के लिए बस कुछ नए नियम-कायदे नत्थी किए और 50 हजार की धनराशि में 50 प्रतिशत कटौती कर पेंशन 25 हजार रुपए कर दी। लेकिन तब तक नीरज जी तो परलोकवासी हो चुके थे। अब यह सवाल तो उठेगा ही कि आखिर 15 महीने से जांच के नाम पर जो पेंशन लटकाए रखी गई, वह नीरज जी के निधन के बाद ही कैसे चंद घंटों में बहाल हो गई। क्या गीतों के राजुकमार के जिंदा रहते यह काम नहीं हो सकता था, जबकि वह महाकवि महीनों से इसकी गुहार लगा रहा हो?

एक ऐसा महाकवि, जिसे सुनने के लिए गणतंत्र दिवस के मौके पर लाल किले के अंदर होने वाले कवि सम्मलेन में लोग रात 3 बजे तक बैठे रहते थे। जबकि उन ऐतिहासिक कवि सम्मलेनों में एक से एक कवि मौजूद रहते थे। लेकिन जनवरी की सर्दी की ठिठुरती रातों में यदि कोई देर रात या तड़के तक रोके रखता था तो वह थे नीरज। आयोजक यह बात भलीभांति जानते थे कि यदि कवि सम्मलेन के मध्य में नीरज का कविता पाठ करा दिया तो उसके बाद कवि सम्मलेन उखड़ जाएगा और वहां बैठे श्रोता धीरे-धीरे खिसक लेंगे। इसलिए नीरज जी का नंबर अंत में आता था। और नीरज जी भी जब झूम कर अपने चिरपरिचित अंदाज में अपनी कविताएं, अपने गीत सुनाते थे तो समां कुछ पल के लिए ठहर सा जाता था।

उनकी हर दूसरी पंक्ति पर वाह वाह, बहुत खूब, वाह क्या बात है, ओह हो से लेकर इरशाद और वन्स मोर तक न जाने कितने ही शब्द गूंजने लगते थे। दरअसल, लाल किले के इस खास कवि सम्मलेन की खास बात यह थी कि इसमें अधिकतर कवि अपनी नई रचनाएं पहली बार यहां ही पढ़ते थे। लेकिन नीरज जी के साथ यह होता था कि उनकी नई रचना के साथ उनसे उनकी पुरानी रचनाओं को सुनाने का भी अनुरोध बराबर होता था। ‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’ जैसे उनके गीत की मांग तो उनके लगभग हर कवि सम्मलेन में रहती थी। लेकिन अब नीरज के निधन के बाद उनकी कविताओं और उनके गीतों का कारवां थम गया है। उनके कवि सम्मेलनों की ऐसी अनूठी यादें अब इतिहास बन गई हैं। साथ ही कसक रह गई है उन्हें ‘यश भारती’ की पेंशन नही मिलने की। नीरज जी ने अपने जीवन में अनकों पंक्तियों की रचना की, लेकिन ये पंक्तियां शायद उन्होंने अपने लिए ही लिखी थीं-

आंसू जब सम्मानित होंगे मुझको याद किया जाएगा
जहां प्रेम की चर्चा होगा मेरा नाम लिया जाएगा।
मान-पत्र मैं नहीं लिख सका
राजभवन के सम्मानों का
मैं तो आशिक रहा जनम से
सुंदरता के दीवानों का
लेकिन था मालूम नहीं ये
केवल इस गलती के कारण
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा।

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