11 जून: लालू यादव के जन्मदिन पर विशेष, हींग वाले ने बना दिया राजेनता

पटना: बिहार की राजनीति के पर्याय रहे लालू प्रसाद यादव एक ऐसे मुख्यमंत्री रहे जिसने चपरासी के आवास में रहकर राज्य सरकार चलाई और सालों तक बिहार की गद्दी पर राज किया. विधायक, दो बार मुख्यमंत्री, लोकसभा सांसद, राज्यसभा सांसद और कैबिनेट मंत्री के रूप में सेवाएं दे चुके लालू यादव बचपन में नेता नहीं डॉक्टर बनना चाहते थे. हाथ से सिले हुए एक बनियान के सहारे बचपन गुजार देने वाले लालू यादव को भाषण देना और लोगों के बीच रहना बचपन से ही पसंद था लेकिन वो कभी राजनीति में नहीं आना चाहते थे. बल्कि वो डॉक्टर बनना चाहते थे. आज11 जून लालू यादव का जन्मदिन है, इस मौके पर हम बता रहे हैं उनसे जुड़े कुछ दिलचस्प पहलुओं के बारे में.

अपनी आत्मकथा ‘गोपालगंज से रायसीना’ में लिखते हैं, ‘स्कूल में दाखिले के बाद मैं डॉक्टर बनना चाहता था. लेकिन मेरे दोस्त बसंत ने बताया कि डॉक्टर बनने के लिए बायोलॉजी से पढ़ाई करनी होगी. इसके बाद मुझे पता चला कि प्रैक्टिकल के लिए मुझे मेंढकों की चीरफाड़ करनी पड़ेगी, जिससे मुझे नफरत थी. इसके बाद मैंने डॉक्टर बनने का इरादा छोड़ दिया.’

हींग बेचने वाले ने बदल डाली लालू की किस्मत

लालू का बचपन बदहाली में बीता. बचपन में कपड़े न होने के कारण लालू रोज नहीं नहा पाते थे. वहीं, ठंड के मौसम में गर्मी पाने के लिए उन्हें पुआल के बिस्तर पर सोना पड़ता था. खाने के लिए उनकी मां मोटे अनाज को उबालकर दूध में मिलाकर दे देती थीं और वो उसे ही स्वादिष्ट भोजन समझ खा जाते थे.

इन सब मुश्किलों के बाद भी लालू अपने बचपन को जी रहे थे. तभी एक घटना ने उनके जीवन को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया. लालू बताते हैं कि उनके गांव में एक हींग बेचने वाला आया. जिसके झोले को लालू ने शरारतन कुएं में फेंक दिया. इसके बाद हींग बेचने वाले ने पूरा गांव अपने सिर पर उठा लिया. इस दौरान लालू की मां ने उनकी शरारतों से परेशान होकर उन्हें बड़े भाई मुकुंद के साथ पटना जाने को कहा.

मुकुंद उस समय पटना चपरासी आवास में रहा करते थे. लालू का गांव छोड़ने का मन नहीं था फिर भी मां के जिद के सामने उनकी एक न चली और पटना जाना पड़ा. बताया जाता है कि अगर हींग बेचने वाला नहीं आया होता तो शायद लालू उतनी जल्दी गांव से बाहर नहीं निकलते. हो सकता था कि बाद में निकलते ही नहीं और निकलते भी तो उनके जीवन की कहानी कुछ और ही होती.

…जब लालू ने पहली बार पहना जूता

पटना पहुंचने के बाद उनका दाखिला शेखपुरा के उच्च प्राथमिक स्कूल में हुआ. स्कूल में उन्होंने एनसीसी जॉइन की और तब उन्हें पहली बार जूता पहनने को मिला. उन्होंने एनसीसी ही इसलिए जॉइन की थी कि उन्हें पूरे कपड़े मिल सकें. क्योंकि एनसीसी के बच्चों को शर्ट, पतलून और जूते मिलते थे.

दिलचस्प बात यह भी है कि आधी से ज्यादा उम्र हेलिकॉप्टर में घूमने वाले लालू स्कूल टाइम में 10 किलोमीटर का सफर पैदल तय कर स्कूल पहुंचते थे. वो भाषण देने और दूसरों की नकल उतारने में माहिर थे. इस कला से वो पटना में भी पहले स्कूल और फिर कॉलेज में मशहूर हुए. कॉलेज में वो लड़कियों के बीच काफी मशहूर थे. वो उन्हें लालू महात्मा कहकर पुकारती थीं क्योंकि उनकी छवि भी कुछ ऐसी ही थी. वो छात्रों की खास तौर पर लड़कियों की खूब मदद करते थे.

लालू का हिन्दी से लगाव

उन्हें हिन्दी और भोजपुरी से शुरू से ही प्यार रहा है. जब उन्हें एलएलबी की परीक्षा में अंग्रेजी में पेपर मिला तो उन्होंने परीक्षा देने से इनकार कर दिया जिसके बाद हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पेपर मुहैया कराया गया.

लालू से शादी को तैयार नहीं थे राबड़ी के चाचा

जून 1973 में लालू यादव की शादी पड़ोस के गांव की लड़की राबड़ी देवी से हुई. उस समय राबड़ी देवी की उम्र 14 साल थी. इस शादी को लेकर राबड़ी देवी के चाचा तैयार नहीं थे. एक टीवी कार्यक्रम में लालू बताते हैं कि राबड़ी देवी के चाचा उनसे शादी लेकर गुस्सा थे. उन्होंने अपना भाई यानी राबड़ी के पिता से कहा कि हमारी लड़की पक्के मकान में रही है और लड़के का मिट्टी का घर है. ऐसे में लड़की कैसे वहां रहेगी. हालांकि, अंत में वो मान गए लालू की शादी राबड़ी देवी से हो गई.

पूड़ी-जलेबी के नाम पर आरएसएस के लोगों को बनाया बेवकूफ

कॉलेज के दिनों में लालू जय प्रकाश नारायण (जेपी) से इतने प्रभावित हुए कि छात्र राजनीति में कूद पड़े. इसके बाद वो जेपी के पीछे-पीछे साये की तरह रहे. लालू बताते हैं, ‘एक बार जेपी ने जेल भरो अभियान शुरू किया और मुझसे बड़ी संख्या में छात्रों को गिरफ्तारी के लिए तैयार करने का निर्देश दिया. उस समय लोग जेल के नाम से डरते थे. फिर भी मैंने17 ऐसे लोगों को तैयार किया जिनमें ज्यादातर एबीवीपी-आरएसएस से जुड़े लोग थे, उन्हें यह कहकर पटना ले आया कि मेरे एक दोस्त के घर में पूड़ी-जलेबी का भोज है. मैंने उन्हें एक पुलिस बस में बैठा दिया जो उन्हें बक्सर जेल लेकर जाने लगी. लेकिन जैसे ही पुलिस की वह बस बक्सर जेल के पास पहुंची, सभी 17 कार्यकर्ता बस से उतरकर फरार हो गए.’

मंत्री बनने के लिए पीएमओ के पास नीतीश के साथ घूमते थे लालू

1989 में बिहार के छपरा लोकसभा से लालू ने चुनाव जीता और बाढ़ लोकसभा से नीतीश ने चुनाव जीता. इस चुनावी वर्ष में वी पी सिंह की अध्यक्षता में राष्ट्रीय मोर्चा ने आम चुनाव के बाद राजीव गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया. जिसके बाद वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने और देवीलाल उप प्रधानमंत्री. यह ऐसा मौका था जब भारतीय जनता पार्टी ने वाम दल के साथ मिलकर सरकार को बाहर से समर्थन दिया था.

इस पूरे घटनाक्रम में दिलचस्प बात यह थी कि जीत के बाद दोनों सांसद (नीतीश और लालू) केंद्र में मंत्री बनने का सपना लेकर दिल्ली पहुंच गए. लालू बताते हैं कि वो और नीतीश कुमार अपनी ओर ध्यान खींचने की उम्मीद में दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के आसपास अपना सबसे अच्छा कुर्ता-पायजामा पहनकर घूमा करते थे.

…जब सबसे बड़े दुश्मन बने लालू के दोस्त

नीतीश कुमार वर्तमान में बिहार के मुख्यमंत्री और लालू के सबसे बड़े दुश्मन कभी उनके सबसे करीबी हुआ करते थे. लालू बताते हैं कि 1985 में जब उनके दल के कुछ नेता लालू को विपक्ष का नेता बनाए जाने के खिलाफ थे तो नीतीश ने ही उन्हें समर्थन दिया और अन्य नेताओं को भी इसके लिए तैयार किया. इसके बाद लालू को विपक्ष का नेता बनाया गया.

पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद लिए ये 3 फैसले

मार्च 1990 में लालू बिहार के मुख्यमंत्री बने. बिहार की सत्ता पर आसीन होते ही लालू ने तीन फैसले लिए… पहला उन्होंने ताड़ी की बिक्री पर लगे कर और उपकर को हटा दिया. दूसरा उन्होंने 150 चरवाहा विद्यालय खुलवाए, ताकि चरवाहे उस समय पढ़ाई कर सकें जब उनके मवेशी चर रहे हों और तीसरा उन्होंने खेतिहर मजदूरों का न्यूनतम पारिश्रमिक को 16.50 रुपये से बढ़ाकर 21.50 रुपये कर दिया.

वीपी सिंह की सरकार को गिरने से बचाया

1990 में ऐसा लगा कि देवीलाल वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लेंगे और लालू देवीलाल गुट के नेता थे. इसके वाबजूद वो रातों रात दिल्ली पहुंचे और वीपी सिंह को एक ऐसा फॉर्मूला दिया जिसके बाद देवीलाल चाहकर भी समर्थन वापस नहीं ले पाए. यही वो समय था जब केंद्र की वीपी सिंह की सरकार बचाने के लिए मंडल आयोग की सिफारिश कोलागू किया गया और पिछड़ों के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू किया गया. दरअसल, देवीलाल पिछड़ों का नेतृत्व करते थे, ऐसे में वीपी सिंह से मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करवाकर लालू ने उनकी छवि एक पिछड़े नेता के रूप में स्थापित की.

रातों-रात पत्नी को बनाया मुख्यमंत्री

पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू 3 महीने चपरासी क्वार्टर में ही रहे जहां स्कूल के दिनों में रहा करते थे लेकिन अधिकारियों के बार बार समझाने के बाद उन्होंने अपना ठिकाना बदला और मुख्यमंत्री अवास में आ गए. 1990 से लेकर 1997 तक लालू दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे. 1997 में जब उन्हें लगा कि वो चारा घोटाला मामले में जेल चले जाएंगे तो उन्होंने रातों-रात अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया. इसके बाद राबड़ी देवी 2005 तक बिहार की तीन बार मुख्यमंत्री बनीं. लालू यादव वर्तमान में चारा घोटाले मामले में जेल में सजा काट रहे हैं.

(लालू यादव की आत्मकथा ‘गोपालगंज से रायसीना‘ के इनपुट के साथ अजीत तिवारी-साभार आजतक)

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