2019 का आम चुनाव क्या पानीपत की तीसरी लड़ाई जैसी है ?

अखिलेश अखिल

पिछले दिनों बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने तो 2019 आम चुनाव की तुलना पानीपत के तीसरे युद्ध से ही कर डाली। भाजपा नेता अक्सर अपनी सुविधा से इतिहास की व्याख्या करते हैं, अमित शाह ने एक बार फिर वही किया। हालांकि लोकतांत्रिक भारत में आम चुनाव को युद्ध की तरह बताना सही नहीं है। क्योंकि इसमें राजनैतिक दलों में जीत या हार होती है, लेकिन जनता तो हर हाल में जीतती ही है, क्योंकि उसके दिए मत से ही सरकार चुनी जाती है। लगता है कि भाजपा का भरोसा इस लोकतांत्रिक निर्वाचन पद्धति से उठता ही जा रहा है। या फिर वे आगामी चुनाव से डर से गए हैं। अमित शाह को लगने लगा है कि 2019 का चुनाव 2014 के चुनाव से इतर होगा। गठबंधन की राजनीति और राहुल गांधी की हुंकार अब बीजेपी पर भारी पड़ती दिख रही है। बीजेपी को डर क्यों लगने लगा है कि अमित शाह आगामी चुनाव की तुलना पानीपत की तीसरी लड़ाई से करने लगे है इस पर हमचर्चा करेंगे। लेकिन पहले पानीपत की लड़ाई पर एक नजर है।
पानीपत का तृतीय युद्ध अहमद शाह अब्दाली और मराठों के बीच हुआ था। पानीपत का तीसरा युद्ध 14 जनवरी, 1761 को मकर संक्रांति के दिन ही लड़ा गया था। इस लड़ाई में मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ अफ़ग़ान सेनापति अब्दाली से लड़ाई के दाँव-पेचों में मात खा गया। इस युद्ध मुख्यतः दो कारणों का परिणाम था – पहला, नादिरशाह की तरह अहमदशाह अब्दाली भी भारत को लूटना चाहता था, दूसरे, मराठे ‘हिन्दूपद पादशाही’ की भावना से ओत-प्रोत होकर दिल्ली को अपने अधिकार में लेना चाहते थे। इसे 18 वीं सदी में सबसे बड़े, लड़ाई में से एक माना जाता है।
14 जनवरी, 1761 को इस युद्ध में मराठा सेना का प्रतिनिधित्व सदाशिवराव भाऊ ने किया था। जबकि विश्वासराव नाममात्र का सेनापति था। यूरोपीय तकनीक पर आधारित मराठों की पैदल सेना एवं तोपखाने की टुकड़ी की कमान इब्राहिम ख़ाँ गार्दी के हाथों में थी। प्रारम्भिक सफलता के अतिरिक्त युद्ध का समस्त परिणाम मराठों के लिए भयानक रहा। मल्हारराव होल्कर युद्ध के बीच में ही भाग निकला और मराठा फ़ौज पूरी तरह से उखड़ गयी। पानीपत की लड़ाई में भाग लेने आए सदाशिवराम राजा भाऊ की सेना ने पानीपत से लगभग सात किलोमीटर दूर जाटल रोड पर बसे गांव भादौड़ में पड़ाव डाला था। पानीपत के खूनी मैदान पर 40 हजार मराठा सैनिकों को मार गिराया गया।न जाने कितने ही कैंप के लोग अफगान सेनिकों की लूट का शिकार बने। इन कैंपों में केवल सैनिक नहीं थे। दरअसल, मराठा सेना अपने पहले के प्रदर्शनों और जीत से काफी आशांवित थी। इसलिए उसने अपने सामान्य नागरिकों को भी सेना के बीच में रहने की अनुमति दे रखी थी।
जाहिर है बजपाध्यक्ष अमित शाह ने आगामी चुनाव के लिए पानीपत लड़ाई की बात रूपक के रूपमे कीहै। शायद वे बीजेपी और खुद को मराठा सेना के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हों जो हिन्दुत्व की लड़ाई लड़ रहे थे और अहमद शाह अब्दालिकी सेना कौए विपक्ष की सेना मान रहे हों। अमित शाह अचानक इस तरह कीतुलना क्यों करने लगे ?क्या उन्हें दिहने लगा है कि आगामीचुनाव की राह आसान नहीं। क्या वे विपक्ष की लामबंदी से डर गए हैं ? क्या उन्हें लगने लगाहै कि अब मोदी मैजिक खत्म हो गया है और जनता का विश्वास अब मोदी सरकार पर नहीं रहा। कई और सवाल है।
2014 में आम चुनावों के पहले भाजपा के प्रचार तंत्र ने देश भर में मोदी मैजिक खड़ा करने की कोशिश की थी और उसमें बहुत हद तक उसे सफलता भी मिली थी। इससे पहले भी देश में चुनाव हुए, लेकिन ऐसी नाटकीय प्रस्तुतियां कभी देखने नहीं मिलीं। अच्छे दिन आने वाले हैं, चाय पे चर्चा, मुझे मां गंगा ने बुलाया है, ऐसे कई जुमले प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और नया मीडिया के सहारे लोगों की जुबान पर बिठा दिए गए।विज्ञापनों के जरिए यही दिखाया गया कि देश की इतनी दुर्दशा पहले कभी नहीं हुई और मोदीजी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार आएगी, तो देश की किस्मत ही बदल जाएगी। लोगों ने इस काल्पनिक तस्वीर पर यकीन करना शुरु कर दिया। भाजपा को भारी बहुमत मिला, उसके बाद कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी उसे जीत हासिल हुई। जहां नहीं हुई और भाजपा ने जोड़-तोड़ कर सरकार बनाई, उस पर भी लोगों ने सवाल नहीं उठाए। लेकिन अब मोदी सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में पहुंच गई है और लोगों को यह एहसास होने लगा है कि फिल्म अब खत्म होने वाली है।
जनता कल्पना की दुनिया से बाहर आने लगी है। उसे समझ आ गया है कि अच्छे दिन अब तक नहीं आए, तो अब क्या आएंगे? जनता अब सच देखने और समझने लगी है, इस बात से भाजपा में बेचैनी बढ़ रही है। पांच विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद भाजपा में जो बौखलाहट नजर आने लगी थी, उसकी व्यापक तस्वीर दिल्ली में दो दिन के राष्ट्रीय अधिवेशन में साफ देखने मिली। इस अधिवेशन में नमो अगेन कैप पहने कार्यकर्ता थे, जगह-जगह अबकी बार फिर मोदी सरकार के पोस्टर बैनर लगे थे, और 2019 में जाइए सब कुछ भूल, याद रखिए सि$र्फ मोदी और कमल का फूल, जैसे नारे गूंज रहे थे। लेकिन फिर भी आम चुनाव में जीत का भरोसा नजर नहीं आ रहा था। देश भर से आए हजारों कार्यकर्ताओं को नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, अरुण जेटली, नितिन गडकरी जैसे तमाम नेताओं ने यही समझाने की कोशिश की कि 2019 में किसी भी तरह भाजपा को जिताना है, वर्ना अनर्थ हो जाएगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने 11 -12 जनवरी के अधिवेशन के समापन पर जो भाषण दिया, उसमें भी लगातार हार का डर नजर आया, हालांकि बात वे लगातार जीत दिलाने की कर रहे थे। अपने घिसे-पिटे अंदाज में उन्होंने बार-बार यही बताने की कोशिश की कि नेहरू-गांधी परिवार के शासन से देश को नुकसान हुआ है, सरदार पटेल, अंबेडकर आदि को उन्होंने फिर राजनैतिकसुविधा के लिए याद किया और कांग्रेस के साथ बन रहे प्रस्तावित महागठबंधन को लेकर भी ताना कसा कि आपको मजबूर सरकार चाहिए या मजबूत सरकार।
डेढ़ घंटे के भाषण में गांधी परिवार को जी भर के कोसने के अलावा वे उन्हीं मुद्दों पर सफाई देते नजर आए, जिन्हें राहुल गांधी पिछले दिनों उठाते आए हैं।राफेल सौदा, सर्जिकल स्ट्राइक, किसानों की दुर्दशा, जीएसटी, नोटबंदी के कारण व्यापारियों और बेरोजगारों की दुर्गति जैसे कांग्रेस के लगाए आरोपों को भाजपा लगातार नकारती आई है, फिर भी मोदीजी ने इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द अपनी बातें रखीं तो ऐसा लगा कि वे भी कहीं न कहीं अपने मुकाबले राहुल गांधी को देखने लगे हैं।
कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली भाजपा अब तक राहुल गांधी को नेता ही नहीं मानती थी, भाजपा समर्थक पप्पू कहकर एक राजनेता के रूप में उनके अस्तित्व को नकारते थे। लेकिन अब मनमौजी कहकर ही सही, लेकिन मोदीजी ने यह बता दिया कि वे अगले चुनाव में राहुल गांधी को अपने प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने लगे हैं और शायद यह मानने लगे हैं कि महागठबंधन बना तो भाजपा के लिए यह कड़ी चुनौती होगी। भाजपा में हार का यह दबा-छिपा डर अब सतह पर आने लगा है। देखने वाली बात यह है कि इस डर को भगाने के लिए भाजपा कौन से नए नारे, जुमले गढ़ती है।

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