सिर पर गठरी लेकर आये, डुबकी लगाई, गंगा का आशीर्वाद लेकर खुशी-खुशी लौटे

लखनऊ ट्रिब्यून (इलाहाबाद ब्यूरो): बसंत पंचमी पर भी श्रद्धालुओं का विशाल रेला पवित्र नदियों गंगा, यमुना व अदृश्य सरस्वती के मिलन स्थल संगम में डुबकी लगाने उमड़ा। इस रेले में दो प्रकार के भारत का दर्शन हो रहा था। शहरी और ग्रामीण अंचलों के लोग अपनी वेश-भूषा से ही अपनी पहचान व्यक्त कर रहे थे। दोनों में फर्क यह भी था कि ग्रामीण जहां सिर पर गठरी और हाथ में झोला लिए संगम तट की तरफ बढ़ रहे थे, वहीं शहरी महंगी अटैचियों-बैगों के साथ आ-जा रहे थे।

दोनों आबादियों के बीच जो खास फर्क दिख रहा था, वह यह कि ग्रामीणों की टोलियों में शामिल महिलाएं अपने-अपने इलाके में गाये जाने वाले लोक गीतों को गाती हुईं गंगा मइया की तरफ बढ़ रही थीं जबकि शहरी महिलाएं चुप थीं। तीनों देवियों और देवाधिदेव भगवान शंकर जी के जयकारे भी ग्रामीण श्रद्धालुओं के ही कंठ से गूंज रहे थे। ग्रामीण और शहरी अंचल में फर्क होने के बावजूद दोनों का लक्ष्य एक ही था, पुण्य की डुबकी लगाना। एक ही घाट पर साथ-साथ स्नान के बाद सूर्य को अध्र्य देना, साथ ही सामूहिक घाट पर ही पूजन-अर्चन करना।

बसंत पंचमी पर भी संगम में उमड़ा श्रद्धालुओं का रेला

इस तरह दोनों आबादियों के वाशिंदे एकमय हो गये थे। दोनों ने साथ-साथ दान भी किये, लेकिन शहरी दान दाताओं में से जहां अधिकतर लोगों के पर्स से पैसे निकल रहे थे, वहीं ग्रामीण श्रद्धालुयों की बोरियों से दान के लिए अन्न निकल रहे थे। फिर भी कहीं से कोई भेद नजर नहीं आ रहा था। भेद पूरी तरह समाप्त हो गया था। समूचा भारत एक साथ खड़ा नजर आ रहा था। पवित्र गंगा जल ले जाने में कोई पीछे नहीं था। कोई गंगाजलि का मुंह पवित्र धारा में डुबा रहा था तो कोई प्लास्टिक की बोतलों को।

ग्रामीण अंचल के गीतों से गुंजायमान हुआ संगम क्षेत्र

खुशी-खुशी स्नान-ध्यान, पूजन-अर्चन के बाद श्रद्धालुओं का रेला जब वापस हुआ, तो इसमें शहरी आगे नजर आये जबकि ग्रामीण श्रद्धालु पवित्र तटों से विदा होकर चले, तो उनके कदम अपने-अपने गांवों से आये कल्पवासियों या फिर अपने-अपने गुरुओं के पंडालों की ओर मुड़ गये। वहां पहुंच कर श्रद्धालुओं ने जलपान किया। दोपहर होते-होते पंडालों में चलने वाले भंडारे शुरू हो गये। भक्तजनों ने पंगत में बैठ कर छककर प्रसाद ग्रहण किया। फिर दूसरे पहर धार्मिक कथाओं का श्रवण किया। कुछ ने संत-महात्माओं के प्रवचन सुने। इस बीच, धीरे-धीरे इनके प्रस्थान का समय हो गया। वापस होते समय इनके सिरों पर पहले जैसे बोझ नहीं थे। जो कुछ खाने या दान के लिए साथ लाये थे, वे अब नहीं थे। इसलिए ये अब भारमुक्त हो गये थे। महिलाओं के हाथों में टंगे झोले जरूर फिर से भर गये थे। उनमें अब सिंदूर, प्रसाद आदि ने स्थान ले लिया था। वे उसे यहां से ले जाकर अपने घर व पास-पड़ोसियों में बांटेंगे।

ग्रामीण और शहरी भारत का पुण्य रेती में मिट गया भेद

एक और खास बात जो दिखी वह यह कि ग्रामीण इलाकों से आये श्रद्धालुओं के संग रहे बच्चों ने अपनी-अपनी पसंद के खिलौने जरूर ले लिये थे। उनके हाथों में आ चुकी बांसुरी तो पुण्य रेती से ही बजने लगी थी। अब उनके अपने बड़े लोग तो चुप थे। उनका पूरा ध्यान अपनों पर केन्द्गित था कि कहीं कोई बिछुड़ न जाए पर बच्चे बेफिक्र थे। वे बांसुरी बजाते हुए चल रहे थे। उनकी दादी, अम्मा, चाची-काकी, बुआ-दीदी जो गाती हुई गंगा तीरे आई थीं, अब वे शांत थीं पर उनके बच्चे बांसुरी में अपनी उखड़ी सांस घोलते हुए चले जा रहे थे। खुशी-खुशी आये और खुशी-खुशी ग्रामीणों को लौटते देख लगा कि गांवों में सहज जीवन अभी बहुत बचा है। बेशक दूरदर्शन, तमाम चैनल्स उन्हें आधुनिकता की ओर खींच रहे हैं, पर ठेठ गंवई उनमें अब भी खूब है।

बसंत पंचमी रविवार को ही दोपहर बाद लग गई थी, इसलिए त्रिवेणी में स्नान, ध्यान, पूजन-अर्चन उसी दिन से शुरू हो गया था। सोमवार को तो वसन्त पंचमी पर्व अपने पूरे उल्लास पर पहुंच गया। सोमवार को दोपहर बाद इस शुभ घड़ी की घड़ियां बीत गई थीं, लेकिन उदयाचल होने की वजह से सोमवार को भी माघ मेले के चौथे स्नान पर्व पर शाम तक स्नान-ध्यान, पूजन-अर्चन जारी रहा। चौतरफा जय मां गंगे, जय मां यमुने, जय मां सरस्वती और हर-हर महादेव की ही गूंज थी।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Loading...
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper