गुदड़ी का लाल निकला ‘सोना’

भारत सिंह

कोई जन्मजात अपंग हो। झुग्गियों में पल कर घुटनों के बल घिसट-घिसट कर लड़खड़ाते हुए बमुश्किल पैरों पर खड़ा हुआ हो। 8 साल की उम्र में ही पिता को सदा के लिए खो दिया हो। महज पेट भरने के लिए अगले 8 साल तक अनाथालय में काटा हो। अनाथालय से निकलने के बाद दो जून की रोटी के लिए महीनों बसों की धुलाई की हो। सड़क किनारे स्थित ढाबों में शरीर और दिमाग की नसों को टाइट कर देने वाले बैरे का कष्टदायक काम किया हो।

…क्या इतने दुर्दिन देखने वाले किसी बच्चे से उसके जवान होने पर उम्मीद की जा सकती है कि एक दिन वह विदेशी जमीं पर देश का तिरंगा शान से जरूर लहरायेगा? शायद ही कोई इस सवाल का जवाब हां में दे सके, लेकिन नारायण ठाकुर, जिसने गर्दिश के ये दिन भुगते हैं, के पास इसका पुख्ता सबूत है और वह है जकार्ता में हुए पैरा एशियन गेम्स में उसके द्वारा 1०० मीटर टी35 रेस में देश के लिए गोल्ड मेडल जीतना।

नारायण ने 14.०2 सेकंड की टाइमिंग के साथ सऊदी अरब के अदावी अहमद (14.4० सेकंड) और हांग कांग के यी चुई बाओ (14.62 सेकंड) को पछाड़ आंधी में दीया जलाये रखने सरीखा यह कमाल 9 अक्टूबर को किया, लेकिन उसके जीवन-संघर्ष में तप कर निकले गोल्ड मेडल के साथ उसकी यह दास्तान तब निकलकर सामने आयी, जब 22 अक्टूबर को दिल्ली स्टेडियम में आयोजित पुरस्कार वितरण समारोह में उसके होंठ अपनी आपबीती के बारे में खुशी में खुले, तो खुलते ही चले गये।

इससे पहले उसने कभी भी अपनी मुफलिसी को लेकर उफ तक नहीं किया था। इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसे 4० लाख रुपये के चेक से नवाजा था। पहली बार वह लाखों का चेक देख रहा था। इसी के साथ उसकी आंखों की रोशनी इस उम्मीद में और चमक उठी कि दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार भी उसकी कुछ आर्थिक मदद कर सकती है। बहरहाल, इन पैसों से वह अपने परिवार के लिए घर बनवायेगा। जो कुछ बचेगा उसे अपनी ट्रेनिंग पर खर्च करेगा। अभी गुटखा-पान की दुकान के जरिए परिवार का खर्च उठा रहे नारायण के परिवार में उसके अलावा मां समेत तीन लोग हैं।

शरीर के बायें हिस्से पर हेमेपेरसिस रोग से पीडित नारायण का जन्म बिहार में हुआ। इस बीमारी में मरीज को ब्रेन स्ट्रोक के बाद शरीर के बायें हिस्से में लकवा मार जाता है। 27 वर्ष के हो चुके नारायण के मुताबिक उसके पिता को दिल की बीमारी की वजह से दिल्ली शिफ्ट होना पड़ा था। वह एक प्लास्टिक फैक्ट्री में काम करते थे और समयपुर बादली की झुग्गी बस्ती में रहते थे। कुछ वर्षों बाद ब्रेन ट्यूमर से उसके पिता का निधन हो गया। वह तब 8 साल का था।

पिता के निधन के बाद मां के लिए अपने तीन बच्चों का लालन-पालन करना मुश्किल हो गया, तो उसे दरियागंज के अनाथ आश्रम में डाल दिया गया, ताकि भरपेट खाना मिलने के साथ पढ़ने का अवसर मिल सके। वह वर्ष 2०1० में अनाथालय से इसलिए निकला, क्योंकि वह खेल के अपने बेइंतहा शौक को पूरा नहीं कर पा रहा था। उसका लगाव क्रिकेट से था, लेकिन महंगा होने का कारण वह इसे अपनी धड़कन नहीं बना सका। फिलहाल, उन्हीं दिनों उसकी झुग्गी बस्ती ढहा दी गयी थी। सिर पर छत जरूरी थी, इसलिए उसने समयपुर बादली के पास परिवार के लिये किसी तरह ठिकाना ढूंढ़ा। आर्थिक हालत पतली थी। इसलिए विवशता में डीटीसी की बसों की सफाई में लगा। फिर ढाबों पर बैरा का काम किया। इतनी मुश्किलभरी जिंदगी में भी खेल के प्रति उसके जज्बे में रत्ती भर कमी नहीं आयी।

नारायण की जिंदगी में बदलाव की दस्तक तब हुई जब एक दिन किसी ने उसे सलाह दी कि अगर वह खेल के जरिए कुछ हासिल करना चाहता है, तो जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम का रुख करे। वहां प्रैक्टिस करेगा, तो उसके अरमान को पंख लगने में देर नहीं लगेगी। हालांकि उसके सामने आर्थिक तंगी सीना ताने खड़ी थी, क्योंकि उसे अपने घर से स्टेडियम तक पहुंचने के लिए तीन बसें बदलनी पड़तीं और इसके लिए उसके पास पैसे होने चाहिए थे, जो नहीं थे। ऐसी स्थिति में उसने सोचा कि क्यों न वह अपना बेस पानीपत शिफ्ट कर ले, लेकिन बस से आने जाने में रोज 4०-5० रुपये नहीं जुटा सकता था, इसलिए इसका इरादा ही त्याग दिया।

आखिर में उसने अपने ठिकाने के नजदीक लक्ष्मी बाई नगर स्थित त्यागराज स्टेडियम को अपने लिए उपयुक्त पाया। फिर उसने वहां कुशल प्रशिक्षकों के निर्देशन में पसीना बहाना शुरू किया, तो उसे यह लगने लगा कि एक दिन वह जरूर कामयाब होगा। जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगिता दर प्रतियोगिता में जब उसने अपनी छाप छोड़नी शुरू की, तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर की कुछ प्रतियोगिताओं में शिरकत करने का मौका मिला।

खेल प्रशिक्षकों की नजरें उसके प्रदर्शन पर थीं। और जब जकार्ता पैरा एशियन गेम्स के लिए खिलाड़ियों की लिस्ट सामने आयी, तो उसका नाम भी उसमें शामिल था। उसने तभी दृढ़ निश्चय किया कि वह इस सुनहरे वक्त को अपने हाथ से नहीं जाने देगा। मेडल पाने के लिए वह अपनी जान लड़ा देगा।

उसने गोल्ड मेडल ग्रहण करते वक्त पोडियम पर तिरंगे को लहराकर यह साबित कर दिया कि हालात कैसे भी हों, दृढ़ निश्चय और लगातार कठिन परिश्रम से कोई भी अपने लक्ष्य को हासिल कर सकता है। आखिर में उसने कहा, ‘मैं देश के लिए जकार्ता में गोल्ड जीतकर काफी खुश हूं। मैं एशियन पैरा गेम्स में 1०० मीटर में गोल्ड जीतने वाला इकलौता भारतीय हूं।’

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