जानिए मिलावट खोरों के खिलाफ नमूने भरने के बाद क्यों नहीं की जाती कार्रवाई ?

लखनऊ : पीएम मोदी और सीएम योगी एक तरफ जहां देश और राज्य से भ्रष्टाचार मिटाने की मुहिम चला रहे हैं. वहीँ उनके ही नाक के नीचे बैठे अफसर खुलेआम भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं. इसी का नतीजा है कि राजधानी लखनऊ में खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत छापे तो खूब मारे जाते हैं. लेकिन नमूने लेने के बाद कार्यवाही कोई नहीं की जाती. जिसके चलते सूबे की राजधनी लखनऊ समेत अन्य जिलों में जमकर मिलावटी खानपान का सामान बेचा जा रहा है.बताया जाता है कि यह खाद्य सामग्री जनता की सेहत के लिए बहुत ही खतरनाक है.

सूत्रों के मुताबिक मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग की मंडलीय टीम के इंस्पेक्टर समय- समय पर शहर की दुकानों और होटलों से खानपान की बेचीं जाने वाली सामग्रियों के नमूने तो ले जाते हैं, लेकिन इन नमूनों की जांच रिपोर्ट क्या आती है ? उसके बाद मिलावटी सामान बेचने वालों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है. इस बात का खुलासा कभी नहीं किया जाता. बताया जाता है कि केएफसी कि लखनऊ शाखा पर 14 जुलाई 2014 को स्वास्थ्य विभाग की मंडलीय टीम के निरीक्षक नंदलाल और अनिल पाल ने छापा मारकर जांच के लिए नमूने भरे थे. लेकिन इन नमूनों की रिपोर्ट में क्या निकला.

इस बात का खुलासा आज तक नहीं किया गया है. और तो और, इन नमूनों के बाद से इस कार्यालय के अफसर से लेकर बाबू तक अपने घरों में उलटे ही यहाँ से नॉनवेज मंगवाकर खाने लगे.गौरतलब है कि कल तक जिस केएफसी की शाखा में मिलावटी सामान बिक रहा था. क्या छापा पड़ने के बाद से यहां चल रहा गोरखधंधा बंद हो गया.

विभागीय सूत्र बताते हैं कि ये गोरखधंधा होटलों और दुकानों पर चलने की बजाय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत जनता की सेहत के नमूने भरने वाले इंस्पेक्टर और उनके साहब कर रहे हैं. दरअसल नमूने की जांच रिपोर्ट आने के बाद दुकानदारों और होटलों के मालिक से अपनी सेटिंग हो जाती है,जिसके बाद लिए गए नमूनों की जांच रिपोर्ट सिर्फ विभागीय पत्रावलियों में ही कैद होकर रह जाती है. इसके एवज में प्रतिमाह खाद्य सुरक्षा अधिनियम की आड़ में अधिकारी और कर्मचारी जमकर धन उगाही करते हैं.

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