क्या शिवपाल यादव का समाजवादी सेक्युलर मोर्चा बनेगा वोट कटवा?

अखिलेश अखिल: सियासी जानकार कह रहे हैं कि जिस तरह से मोदी सरकार के विरोध में विपक्ष एक होकर आगामी चुनाव में भाजपा की राजनीति को कुंद करना चाहता है, ऐसे में देश में अन्य राज्यों के मुकाबले सबसे अधिक सांसद देने वाले उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के पूर्व नेता शिवपाल यादव का नया राजनीतिक अवतार साफ तौर पर सपा-बसपा के संभावित गठजोड़ को कमजोर करने की कोशिश भर है। यह भी कहा जा रहा है कि आसन्न चुनाव के समय इस तरह के खेल, जैसा कि शिवपाल ने समाजवादी सेक्युलर मोर्चा बनाकर शुरू किया है, महज वोटकटवा से ज्यादा कुछ भी नहीं है। इसी तरह की बातें पिछले दिनों सपा महासचिव रामगोपाल यादव ने भी एक जनसभा में कही थी। हालांकि उन्होंने न तो शिवपाल का नाम लिया था और न ही शिवपाल की नवजात पार्टी के बारे में ही कुछ कहा था। फिलहाल इशारे-इशारे में शिवपाल पर करारी चोट मारी थी यह कहते हुए, ‘अमर सिंह ने लोकमंच पार्टी बनाई थी। पिछले चुनाव में इसके बैनर तले वह 4०3 सीटों पर चुनाव भी लड़े, लेकिन आज लोकमंच का कोई नाम लेने वाला तक नहीं है। राजनीति में इस तरह के लोगों का यही हश्र होता है। यह सारा खेल भाजपा खेल रही है, ताकि सपा-बसपा और कांग्रेस के मतदाताओं को बेदखल किया जा सके। इसके लिए वोटकटवा अभियान चलाया जा रहा है।’
अब जरा; शिवपाल क्या कह रहे हैं, उसे जानिए। हाल ही में शिवपाल ने एक साक्षात्कार में यह पूछने पर कि क्या उनका मोर्चा लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन के लिए वोटकटवा बनेगा, तो उनका जवाब था, ‘इससे साफ है कि हमारी भी कोई हैसियत है। हमारे पास जनाधार है। अगर मोर्चा की हैसियत है, तो हमें भी गठबंधन में शामिल करो। गठबंधन से हमें कोई परहेज नहीं। मोर्चा भी इसीलिए बनाया गया है। हमारी हैसियत के हिसाब से लोकसभा चुनाव में सीटें देनी पड़ेंगी। मैं गठबंधन का हिस्सा बनने के लिए तैयार हूं। ऐसा नहीं हुआ, तो मोर्चा सभी 8० सीटों पर चुनाव लड़ेगा।’ अलबत्ता भाजपा से नजदीकियों की बाबत किये गये सवाल पर वह भड़क गये थे। एक सांस में बोले, ‘यह आरोप गलत है। मैंने न तो भाजपा के लोगों से कोई बातचीत की है, न ही भाजपा के लोगों ने मुझसे। मैं मुख्यमंत्री से मिला था। मैंने भाजपा सरकार में फैले भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाई है। मैंने जिस संघर्ष का ऐलान किया है उसे भटकाने के लिए ऐसी बातें की जा रही हैं।’
याद रहे राष्ट्रपति चुनाव में शिवपाल यादव ने भाजपा को समर्थन दिया था, लेकिन अब कह रहे हैं कि वह भाजपा के भ्रष्टाचार के विरोध में आवाज उठा रहे हैं। कथनी में यही फर्क, तो राजनीति है। राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा को समर्थन देने के सवाल पर उनका कहना था, ‘मैंने डंके की चोट पर भाजपा उम्मीदवार को वोट दिया था। आप मुझसे वोट मांगोगे नहीं, किसी बैठक में नहीं बुलाओगे, मेरी उपेक्षा करोगे, तो मैं आपका समर्थन कैसे करूंगा। राज्यसभा चुनाव में आप ने बुलाया, तो मैंने आपका समर्थन किया।’ शिवपाल ने इन शब्दों के जरिए अपने भतीजे व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर भड़ास निकाली थी।
फिलहाल सियासी गलियारों में कहा, तो यही जा रहा है कि शिवपाल भाजपा के इशारे पर चल रहे हैं। भाजपा अच्छे से जानती है कि अगर सपा-बसपा गठबंधन साकार हो गया, तो आगामी लोकसभा चुनाव में उसे यूपी में 2०14 के मुकाबले जितनी सीटें लाना बेहद कठिन हो जाएगा। और अगर यूपी में भाजपा को अपेक्षा के मुताबिक सीटें नहीं मिलीं, तो साफ है कि भाजपा का सत्ता में दोबारा आ पाना संभव नहीं होगा। सपा-बसपा के गठबंधन से उप चुनाव में भाजपा यूपी की तीन अहम सीटें हार चुकी है। भाजपा यह भी जानती है कि ये मामूली सीटें नहीं थीं, बल्कि ये उसके गढ़ से जुड़ी थीं। भाजपा इन सीटों पर गुमान करती रही है। तीन सीटों पर हार का मतलब है मुख्यमंत्री योगी से लेकर उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की हार। ऐसे में भाजपा सपा परिवार के झगड़े को और बढ़ाना चाहती है, ताकि उसे लाभ मिल सके। पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भी जैसे-जैसे सपा परिवार में झगड़े तेज होते गये भाजपा आगे बढ़ती चली गयी और सपा साफ हो गई। इस स्थिति में, तो यही प्रतीत होता है कि भाजपा ने शिवपाल को मोहरा बना लिया है।
सपा परिवार के झगड़े के घटनाक्रम को देखें, तो कई बातें सामने आती हैं। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव के परिवार में मची रार को सुलझाने के प्रयास के बीच पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष फरहत हसन खान ने जून में शिवपाल यादव सेक्युलर मोर्चा का गठन किया था। बावजूद इसके शिवपाल ने अपने करीबी फरहत के इस प्रयास से दूरी बना रखी थी। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव के बीच बनी खाई को पाटने के प्रयास जैसे-जैसे बेअसर होते गए लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग पर स्थित सपा के प्रदेश कार्यालय से कुछ दूरी पर स्थित लोहिया ट्रस्ट के दफ्तर में सरगर्मियां बढ़ती गईं। ट्रस्ट के सचिव शिवपाल यहां नियमित मीटिंग कर अपने समर्थकों को एकजुट करने में जुट गए। इसी बीच शिवपाल के करीबी और राज्यसभा सांसद अमर सिंह ने 28 अगस्त को लखनऊ में एक कार्यक्रम में खुलासा किया, ‘मैंने शिवपाल को भाजपा में लाने के लिए कई बड़े नेताओं से बात की थी और मिलने के लिए बुलाया था, पर वे नहीं आए।’ इस बयान ने हाशिए पर चल रहे शिवपाल के सियासी वजूद पर नई बहस छेड़ दी। इसको विराम देने के लिए शिवपाल सामने आए और 24 घंटे के भीतर उन्होंने समाजवादी सेक्युलर मोर्चा बनाने की घोषणा कर दी। शिवपाल की यही कहानी बहुत कुछ कह देती है।
यह बात और है कि अखिलेश से विवाद के चलते शिवपाल पिछले दो वर्षों के दौरान यादव परिवार में अलग-थलग पड़ गए थे, लेकिन अलग वजूद की तलाश में शिवपाल ने पिछले वर्ष 5 मई को इटावा में अपने बहनोई अजंट सिंह यादव के घर में मुलायम सिंह के साथ बैठक कर सेक्युलर मोर्चा के गठन की घोषणा कर दी थी। तब मुलायम ने शिवपाल को मनाने की हर संभव कोशिश की थी और उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय करने का भरोसा दिलाया था। शिवपाल ने अपने चचेरे भाई और सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव से भी दूरियां खत्म करने की कोशिश की पर वह पार्टी की मुख्यधारा में न आ सके।
अब यूपी की राजनीति में शिवपाल के नये अवतार ने प्रदेश का सियासी तापमान बढ़ा दिया है। अखिलेश के नेतृत्व वाली सपा से युवाओं का जुड़ाव भले ही हो पर जनाधार वाले कई वरिष्ठ नेताओं पर शिवपाल की अच्छी पकड़ है। सियासी विश्लेषक अनुमान लगा रहे हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले शिवपाल का अलग मोर्चा बनाना भाजपा विरोधी विपक्षी एकता को कमजोर करेगा। गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. बद्री नारायण कहते हैं, ‘यूपी के हर जिले में शिवपाल के समर्थक हैं। शिवपाल के अलग राह पकड़ने से सपा के मूल वोट बैंक में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है, जो सपा-बसपा के संभावित गठबंधन के लिए अनुकूल नहीं है। भाजपा भी यही चाहती है। हालांकि अखिलेश के पक्ष में किसी प्रकार की सहानुभूति न पैदा हो, इसके लिए शिवपाल ने बड़ी चतुराई से सपा-बसपा गठबंधन में शामिल होने की बात कही है।’ सपा के एक प्रदेश सचिव कहते हैं, ‘पूर्व में बसपा अध्यक्ष मायावती को लेकर शिवपाल यादव ने काफी अमर्यादित बयान दिए थे। इसलिए शिवपाल को लेकर बसपा नेताओं में हिचक है। उनके सपा से अलग राह पकड़ने पर सपा-बसपा के बीच संभावित गठबंधन की बातचीत में आसानी होगी। शिवपाल के लिए छोटे दलों को सेक्युलर मोर्चा से जोड़ना आसान नहीं होगा।’
बहरहाल सेक्युलर मोर्चा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए शिवपाल यादव ने युवाओं को आगे कर दिया है। उनके बेटे आदित्य यादव शिवपाल यादव फैंस एसोसिएशन के बैनर तले युवा नेताओं को मोर्चा में शामिल करने में जुटे हुए हैं। शिवपाल यादव फैंस एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष आशीष चौबे कहते हैं, ‘यूपी के 6० जिलों में एसोसिएशन की 51 सदस्यीय कार्यकारिणी का गठन हो चुका है। हमारा संगठन उपेक्षित नेताओं को सेक्युलर मोर्चा से जोड़ने में लगा है। इसके लिए संगठन को पूर्वी, मध्य और पश्चिमी जोन में बांटा गया है।’ इटावा में ‘मुलायम के लोग’ नामक संगठन बनाकर पूर्व जिलाध्यक्ष सुनील यादव उपेक्षित सपा नेताओं को एक मंच पर लाने में जुटे हैं। इंटरनेशनल सोशलिस्ट काउंसिल के निर्वाचित सचिव और अफ्रीका का प्रतिष्ठित मंडेला सम्मान पाने वाले समाजवादी नेता दीपक मिश्र पूर्व में सपा प्रबुद्घ प्रकोष्ठ के अध्यक्ष रह चुके हैं। शिवपाल के नजदीकी मिश्र पर देश भर में समाजवादी विचारधारा से जुड़े नेताओं को सेक्युलर मोर्चे से जोड़ने की जिम्मेदारी है।
सबसे ज्यादा सियासी हलचल यादव बेल्ट कहे जाने वाले मैनपुरी, इटावा, फिरोजाबाद, संभल जैसे जिलों में है। मुलायम सिंह के गृह जिले इटावा में पूर्व विधायक रघुराज सिंह शाक्य, पूर्व विधायक सुखदेवी वर्मा, पूर्व जिलाध्यक्ष सुनील यादव, जसवंतनगर नगर पालिका के चेयरमैन सुनील कुमार जौली समेत कई जनाधार वाले नेता शिवपाल के कट्टर समर्थक माने जाते हैं। इन नेताओं ने भले ही सपा न छोड़ी हो पर शिवपाल के मोर्चे के समर्थन में आकर ये पार्टी को कमजोर करने का अपरोक्ष प्रयास जरूर करेंगे। हालांकि शिवपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती खुद की सियासी हैसियत खड़ी करने की है। सेक्युलर मोर्चा के गठन से अगर भाजपा की बांछें खिली हैं, तो अखिलेश यादव के करीबी सपा नेता भी राहत महसूस कर रहे हैं।
शिवपाल की पार्टी आज भले ही अखिलेश यादव को सबक सिखाने की कोशिश कर रही हो, लेकिन कहने में गुरेज नहीं कि इस तरह जन्मीं पार्टियां ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पातीं। विरोध के नाम पर खड़ी क्षेत्रीय पार्टियों में न कोई आदर्श होता है, न ही राष्ट्रीय समझ। ऐसे में भले ही शिवपाल अपने मोर्चे के जरिए सपा-बसपा गठबंधन को नुकसान पहुंचाकर भाजपा को लाभ दिला दें, लेकिन अपने देश में वोटकटवा पार्टी की जब पहचान हो जाती है, तो जनता उसे जमींदोज भी कर देती है।

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