लॉकडाउन ने प्रभावित किया बच्चों का संसार, कशमकश में बचपन

मनोज वार्ष्णेय

लॉकडाउन से आम जनता बुरी तरह प्रभावित हुई है,लेकिन इसका असर बच्चों पर इतना पड़ा है कि वह कशमकश में आ गए हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि यह लॉकडाउन उनके लिए खुशी का पैगाम लेकर आया या फिर मुसीबत। दरअसल छुट्टी होने पर सबसे अधिक प्रसन्नता बच्चों को होती है और वह पूरी तरह इनका आनंद लेते हैं। पर इस बार उल्टा हुआ। कोरोना से बचने के लिए जब सरकार ने देश में लॉकडाउन घोषित किया तो बच्चों को,खासकर 5-11 साल के बच्चों को लगा कि उनके लिए मस्ती के दिन आ गए। आरम्भ के एक हफ्ते उन्होंने मस्ती की भी,परंतु बाद में उन्हें यह बंधन लगने लगा। जब स्कूलों ने बच्चों को बांधने के लिए आनलाईन कक्षाएं आरम्भ कीं तो वह और परेशान हो गए कि ऐसी छुट्टियों का क्या फायदा की मम्मी-पापा के सामने पढ़ों?

समस्या तब और हो गई जब उन्हें शैतानी के लिए रोकने वाले अभिभावक भी घर पर ही रहे और उनकी हर गतिविधि पर नजर रखी। लॉकडाउन के खत्म होने से पहले ही लगभग हर मीडियम के विद्यालय में ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित हो जाने से भी बच्चे कशमकश में आ गए हैं कि वह अब कब स्कूल जाएंगे और अपनी मस्ती भरी लाइफ का आनंद लेंगे। अब जरा एक नजर डाल लें कि आखिर बच्चों के साथ ऐसा क्यों हो रहा है कि वह छुट्टियों का आनंद लेने के स्थान पर परेशान अधिक हो रहे हैं। बच्चे को हमेशा यही लगता रहा कि अब उनका स्कूल खुल जाएगा,लेकिन लॉकडाउन की अविधि में विस्तार होने से वह आत्मविश्वास के साथ होकर छुट्टियों का आनंद लेने से वंचित रह गए।

लॉकडाउन का आनंद

बच्चों ने लॉकडाउन होते ही मस्ती में अपनी किताबें आदि उठाकर रख दीं। इसके पीछे एक कारण यह भी था कि उनकी कक्षाएं लगभग पूरी हो चुकी थीं और परीक्षाएं समाप्त हो गई थीं। आरंभ में उन्होंने जमकर घर में ही गेम खेले। माता-पिता के मोबाइल उनके ही हाथ में रहे,फिर जब रामायण और महाभारत जैसे सीरियल आना आरंभ हुए तो उन्होंने माता-पिता के साथ उनका आनंद लिया। लंबे समय बाद बच्चे पूरे परिवार के साथ टीवी देख रहे थे और बिना कार्टून के दूरदर्शन देखते हुए जिद्द नहीं कर रहे थे। जब वह दूरदर्शन नहीं देख रहे थे तब उन्होंने दूसरे गेम खेले,मां के साथ खाना बनाना सीखा,योगा क्लास ज्वाइन कीं,घर की छतों पर अपने भाई-बहनों के साथ बातें करते हुए कोरोना और उसके उपायों पर चर्चा की। बच्चों को देखकर लग रहा था कि जैसे लॉकडाउन हुआ ही नहीं है।

होने लगे परेशान
चूंकि विद्यालय बंद थे और बच्चों को घर के अतिरिक्त कहीं भी जाने की छूट नहीं थी,फिर जैसे ही आनलाईन क्लासें आरंभ हुई तो बच्चों को झुझलाहट होने लगी। उनके लिए दुनिया घर के अंदर ही सिमट गई,जबकि उनकी दुनिया स्कूल में दोस्तों के साथ मस्ती और शैतानियों के साथ पढ़ाई तक फैली हुई है। बच्चों के हाव-भाव से परिवार के लोगों को परेशानी महसूस हुई तो उन्होंने उन्हें काम के टारगेट देना आरंभ कर दिया। बच्चों की रचनात्मकता कम न हो और वह निराशा के शिकार न हो इसके लिए परिवार के दूसरे लोगों ने उन्हें दूसरे कामों में लगाया। कुछ ने यूट्यूब के लिए मोटिवेशनल वीडियों बनाए तो किसी ने मां के साथ गाने का शौक पूरा किया।

अब आगे क्या?
ग्रीष्मकालीन अवकाश में आमतौर पर बच्चे या तो माता-पिता के साथ कहीं घूमने जाते थे या फिर दादा-दादी,नाना-नानी अथवा किसी दूसरे रिश्तेदार के घर चले जाते थे। पर जब पूरा देश ही बंद है और लोग कहीं भी आने-जाने से बच रहे हैं तो बच्चों के लिए यह परेशानी स्वाभाविक है कि वह इन छुट्टियों का उपयोग कैसे करें? घर से निकलना नहीं हैं तो हॉबी क्लासेज भी नहीं जा सकते,खेलने के लिए मैदान में जाना मना है,यहां तक की पड़ोस में भी जाने से माता-पिता रोक रहे हैं। इन हालातों में बच्चों के लिए छुट्टियां कशमकश का पैगाम लेकर आई हैं।

क्या परेशानी हो सकती है?
बच्चे जब अपने स्वाभाविक जीवन का आनंद नहीं लेंगे तो उनके अंदर तमाम परेशनियां पैदा हो सकती हैं । वे न सिर्फ चिड़चिडेपन के शिकार होंगे बल्कि उनकी भूख भी प्रभावित हो सकती है। दूसरे बच्चों के साथ अपनी बातें शेयर नहीं कर पाने से भी वह एक तरह के पैनिक के शिकार हो सकते हैं। घर में भले ही वह कितना भी खेल लें लेकिन मैदान आदि में नहीं खेल पाने से उनके शारीरिक विकास पर भी असर आने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता। बच्चों की परेशानी को लेकर किए गए सर्वे में एक परिवार ने यहां तक कहां कि छुट्टियों में बच्चों ने इतना परेशान किया कि पालतू डॉगी को भी प्रताड़ित करने लगे।

परिवार का महत्व समझा
हमारे घर में सात बच्चे हैं और इस लॉकडाउन में हमने उनके साथ मित्रवत व्यवहार किया। बच्चे समझ गए हैं कि एक बड़े परिवार का महत्व क्या होता है और बड़ों से कैसे रोज कुछ नया सीख सकते हैं।

राजकुमार खंडेलवाल,अभिभावक
लगा ही नहीं लॉकडाउन है

बच्चों ने इस दौराना कागज से वोट बनाना सीखा। क्रॉफ्ट से कुछ नया बनाया। छत पर योगा की खुद ही क्लास लगाकर उसमें सभी को कुछ न कुछ सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। हमें तो लगा ही नहीं कि लॉकडाउन है।
हर्ष विजय,अभिभावक

मोटिवेशनल स्पीच सुनी और वीडियो बनाए
मैंने इस दौरान खूब मस्ती की,स्कूल का होमवर्क पूरा किया। बाद में पापा के साथ मिलकर कोरोना से बचाव के लिए वीडियो भी बनाया और उसे यूट्यूब पर अपलोड किया।
भाव्या गुप्ता,स्टूडेंट

दीवारों से पेंट गायब
पूरा लॉकडाउन हमारे लिए मुसीबत बन गया। बच्चों ने जमकर धमाल मचाया। यहां तक की घर की दीवारों पर भी चित्रकारी कर दी। हम तो यह भी समझ नहीं पा रहे कि इनका मूल रंग कौन सा है। अब ग्रीष्मकालीन अवकाश आ गया है तो पता नहीं क्या करेंगे यह। हां,यह घर पर ही रहे और कोई बड़ा नुकसान नहीं किया यह संतोष की बात है।
सानिया कथुरिया,अभिभावक

मानसिक तौर पर सहयोग करें
लॉकडाउन का सबसे बड़ा असर बच्चों पर यह हुआ कि वह अपनी स्व•ााविक क्रियाएं नहीं कर पाए। ऐसे में उनकी भूख कम हो सकती है,वह थोड़े से उग्र •ाी हो सकते हैं। क्योंकि वह अपने समकक्ष बच्चों के साथ नहीं रह सके,इसलिए उनके माता-पिता अब ग्रीष्म कालीन अवकाश के दौरान उन्हें दोस्तों आदि की कमी महसूस न होने दें। उनके साथ बच्चों की तरह ही व्यवहार करें और खेल आदि खेलें।
डा.अखिलेश जैन,वरिष्ठ मनोचिकित्सक

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