नोबल पुरस्कार पाने वाली मलाला को भाया मुरादाबाद की तीन बेटियों का संघर्ष

मुरादाबाद। पाकिस्तान में आतंकियों के जुल्मों सितम के बीच अपनी पढ़ाई जारी रखकर नोबल पुरस्कार पाने वाली मलाला यूसुफजई को जिले की तीन गरीब बेटियों का संघर्ष इतना भाया कि उन्होंने विश्व स्तर पर लड़कियों में शिक्षा की अलख जगाने के लिए इन्हें अपना ब्रांड एम्बेसडर बना लिया। इन बेटियों का नाम है रजिया, सोनम और तंजीम।

अमेरिका में मलाला फंड में काम करने वाली भारतीय मूल की भूमिका के निर्देशन में हाल में आयी कम्युनिकेशन टीम नव भारत समाज कल्याण समिति की महासचिव व समाजसेविका रेहाना रहमान के सहयोग से तीनों बेटियों की पढ़ाई के लिए संघर्ष करने की लघु फिल्म बनाकर ले गयी। संस्था विश्वभर में इन बेटियों को ब्रांड एम्बेसडर के रूप में स्थापित कर इनके संघर्ष की कहानी दिखाकर गरीब बेटियों को शिक्षा के लिए प्रेरित करेगी।

मलाला फंड ने यू-ट्यूब पर सोनम के वीडियो को शेयर किया है। इसमें दिखाया गया है कि गरीबी से संघर्ष कर किस तरह पढ़ाई को जारी रखा जा सकता है। अब्दुल्लापुर गांव के रहने वाले तांगा चालक पृथ्वीलाल की बेटी सोनम की पढ़ाई किताबों के लिए रुपये न होने की वजह से 7वीं कक्षा में छूट गई थी। बावजूद इसके सोनम ने हिम्मत नहीं हारी।

उसने खेतों में मजदूरी की। पैसे बनाये। उससे खुद तो पढ़ने लगी ही, अपनी तीन बहनों की पढ़ाई का भी जिम्मा लिया। 12वीं में पढ़ रही सोनम को हाईस्कूल में 84 फीसदी अंक मिले थे। रहमाननगर बांहपुर गांव के नेत्रहीन कल्लू की बेटी रजिया की भी पढ़ाई गरीबी के कारण 5वीं में छूट गयी थी। उसने भी खेतों में मजदूरी कर फिर से पढ़ाई शुरू की।

9वीं में पढ़ रही रजिया के संघर्ष का प्रभाव उसके गांव की 1० बेटियों पर पड़ा, तो उन सब ने स्कूल में दाखिला ले लिया। मजरा बांहपुर गांव के मोमीन अहमद की बेटी तंजीम हाईस्कूल में पढ़ रही है। उसने मदरसे से पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन फीस जमा करने के लिए परिवार वालों के पास रुपये नहीं थे।

रेहाना ने उसके परिजनों को समझाया, तो उसका दाखिला गांव के ही जूनियर हाईस्कूल में कराया गया। इस स्कूल में फीस, तो नहीं देनी थी, लेकिन किताबें खरीदने के लिए उसके पास भी रुपये नहीं थे। ऐसी स्थिति में तंजीम ने किताबों के लिए खुद संघर्ष किया और पढ़ाई जारी रखी।

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