नरेंद्र मोदी के लिए आसान नहीं होगी 2019 की राह, जानिए क्या हैं मुश्किलें

आलोक कुमार

कहा जाता है कि दिल्ली की गद्दी तक का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। 2014 में सभी ने यह देखा भी कि किस तरह से यूपी की 80 में से 73 सीटें जीतकर भाजपा ने केंद्र में जबरदस्त बहुमत वाली सरकार बनाई थी। इसी उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने दो तिहाई बहुमत से यहां सरकार बनाई। लेकिन, भाजपा की प्रदेश सरकार के कार्यकाल का एक साल भी पूरा नहीं हुआ कि मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के गढ़ में ही सत्तारूढ़ पार्टी को करारी हार मिली। गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीटों पर भाजपा की हार के बाद अब सवाल उठने लगा है कि क्या भाजपा का ग्राफ उतार पर है?

मात्र दस दिन में उतरी जीत की खुमारी : पूर्वोत्तर में जीत पर देशभर में जश्न मनाने वाली भाजपा को अंदाजा भी नहीं था कि केवल 10 दिन बाद इतना तगड़ा झटका लगेगा। यूपी और बिहार के उपचुनाव में मिली करारी हार ने भाजपा में खलबली मचा दी है। बिहार की हार को छोड़ भी दिया जाए, लेकिन यूपी के गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा का हारना बड़े खतरे का इशारा कर रहा है।

खतरे की घंटी : गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा को मिली हार के पीछे ज्यादातर लोगों की यही राय है कि ऐसा इसलिए मुमकिन हुआ, क्योंकि अखिलेश और मायावती साथ आ गए। बात सही है कि अगर इन दोनों सीटों पर बसपा उम्मीदवार उतारती तो फायदा भाजपा को मिलता। उधर बिहार में अररिया लोकसभा सीट पर राजद उम्मीदवार का बड़े अंतर से जीतना न सिर्फ भाजपा, बल्कि नीतीश कुमार के लिए भी बड़ा झटका है। यूपी और बिहार में मिली हार से साफ है कि भाजपा और मोदी के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव आसान नहीं होगा।

यूपी में दस्तक देगा नया गठजोड़ : 2019 को लेकर सपा और बसपा ने अभी गठबंधन का ऐलान नहीं किया है, लेकिन उपचुनाव नतीजे के बाद अखिलेश का मायावती की तारीफ करना और फिर लखनऊ में उनके घर जाकर उनसे एक घंटे तक मुलाकात करना बताता है कि भाजपा को हराने के लिए दोनों साथ आ सकते हैं। हो सकता है कि कांग्रेस भी इन दोनों दलों के साथ आ जाए।

खत्म हो रहा है मोदी मैजिक? : क्या मोदी के खिलाफ विपक्ष का एकजुट होना ही भाजपा के लिए खतरा है। भाजपा को भले ही इसका अहसास नहीं हो, लेकिन यूपी और बिहार में हुए उपचुनाव के नतीजे इस बात के संकेत दे रहे हैं कि जो जनता कल तक भाजपा के साथ थे, अब धीरे-धीरे उसके खिलाफ हो रहे हैं। गोरखपुर जैसी सीट पर भाजपा का हारना एक बात तो साफ करता है कि लोग गुस्से में हैं। कई राजनीतिक पंडित अब खुले शब्दों में स्वीकार करने लगे हैं कि शाइनिंग इंडिया की तरह अच्छे दिन वाला जुमला ही भाजपा को ले डूबेगा।

मोदी की राह के कांटे
– महाराष्ट्र में पिछली बार कांग्रेस-एनसीपी अलग-अलग चुनाव लड़ी थीं, लेकिन सोनिया गांधी के घर डिनर पार्टी में पहुंचकर शरद पवार ने संकेत दे दिया है कि अब आगे ये गलती नहीं दोहराएंगे।
– भाजपा से नाराज शिवसेना अगर लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधन तोडऩे का ऐलान कर देती है तो नुकसान भाजपा को ही होगा।
– आंध्र प्रदेश में जो हो रहा है वो सभी को मालूम है। ताजा घटनाक्रम में टीडीपी ने राजग से भी नाता तोड़ लिया है।
– बंगाल में भाजपा को परास्त करने के लिए ममता कांग्रेस से हाथ मिला सकती हैं।
– राजस्थान और मध्य प्रदेश में चुनाव हुए तो वहां भाजपा के लिए वापसी करना आसान नहीं होगा। राजस्थान में हुए उपचुनाव में हार के बाद वसुंधरा के खिलाफ बगावत के सुर तो नरम पड़ गए हैं, लेकिन वहां कांग्रेस का पलड़ा भारी दिख रहा है। कमोबेश यही हाल मध्य प्रदेश का है।

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