मुश्किल में राजग, कहीं मौके का फायदा कांग्रेस को न मिल जाए

आलोक कुमार

चंद्रबाबू नायडू ने राजग का साथ छोड़ दिया। शिवसेना पहले ही नाराज चल रही है और जीतन राम मांझी भी राजग का दामन छोड़ चुके हैं। कश्मीर, पंजाब और महाराष्ट्र की जिन प्रांतीय पार्टियों से भाजपा का गठबंधन है उनके साथ उसकी तनातनी पहले से ही चल रही है। दरअसल, ज्यों-ज्यों 2019 का आम चुनाव पास आता जा रहा है, भारतीय जनता पार्टी की मुसीबतें बढ़ी जा रही हैं।

भाजपा को हालिया झटका देने वाली आंध्र प्रदेश की तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) की मांग है कि आंध्र को विशेष श्रेणी राज्य का दर्जा दिया जाए। पार्टी यह मांग 2014 से ही कर रही है, जबसे आंध्र प्रदेश का विभाजन करके तेलंगाना राज्य का निर्माण हुआ है। गौरतलब है कि विशेष श्रेणी राज्य का दर्जा उन्हीं राज्यों को दिया जाता है, जो बहुत दुर्गम हों, गरीब हों, कम जनसंख्या वाले हों और जिनके आय के स्रोत बहुत कम हों। ऐसे राज्यों के कुल खर्च का 90 फीसदी केंद्र सरकार देती है। ऐसे राज्यों में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, असम, अरुणाचल, नगालैंड, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा, सिक्किम और मणिपुर शामिल हैं। राजग में इन दिनों चल रही इस कलह का फायदा कांग्रेस को मिलने की संभावनाएं सबसे ज्यादा दिख रही हैं।

चलन बन गया है विशेष श्रेणी का दर्जा मांगना : आजकल बिहार, तमिलनाडु और गोवा ने भी विशेष श्रेणी की रट लगा रखी है। केंद्र सरकार आंध्र को यदि वह दर्जा दे देगी तो देश के कई और राज्य कतार लगाकर खड़े हो जाएंगे।

नायडू का अपना गणित : नायडू के इतने सख्त रवैए के पीछे दो कारण हैं। पहला यह कि आंध्र प्रदेश में विरोधी दल ‘रेड्डी कांग्रेस (वाईएसआर कांग्रेस) के नेता जगन मोहन रेड्डी ने विशेष श्रेणी की मांग को उग्र आंदोलन का रूप दे दिया है। इससे चंद्रबाबू नायडू की कुर्सी खतरे में है और यह वह बर्दाश्त नहीं कर सकते। यही वजह है कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर मिलने का समय नहीं देने का आरोप लगाते हुए राजग से किनारा कर लिया।

कांग्रेस को हो सकता है फायदा : आंध्र में समीकरण बिगडऩे से कांग्रेस का पाया मजबूत हो सकता है। रेड्डी की कांग्रेस और राहुल की कांग्रेस में 36 का आंकड़ा है। वे तो मिल ही नहीं सकते, लेकिन कांग्रेस और टीडीपी का गठजोड़ हो सकता है। अगर ऐसा हो गया तो इसका असर समूचे देश पर पड़ेगा। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की दोस्ती सबके सामने है। यह लहर पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, बिहार और तमिलनाडु तक फैल गई तो 22 प्रांतों में राज करने वाली भाजपा को हाशिए पर लगते दर नहीं लगेगी।

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