रॉकेट वैज्ञानिक नंबी ने 24 साल तक झेला पुलिस का दंश, जानें क्यों और कैसे

Published: 14/09/2018 7:31 PM

नई दिल्ली. इसरो के रिटायर वैज्ञानिक एस. नंबी नारायणन के लिए 14 सितंबर का दिन बड़ा ही अहम है। अहम इसलिए क्योंकि वह 24 साल बाद षड्यंत्र, आरोप, गिरफ्तारी और फिर कोर्ट की तारीख दर तारीख से इसी दिन पूरी तरह बेदाग हुए। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अपने फैसले में कहा कि केरल पुलिस ने वैज्ञानिक नारायणन को बेवजह गिरफ्तार किया था और उन्हें मानसिक प्रताड़ना दी। इसलिए वैज्ञानिक को 5० लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।
तो आइए जानते हैं रॉकेट साइंटिस्ट एस नंबी नारायणन को इतने लम्बे वक्त तक बुरे दिनों से क्यों जूझना पड़ा। इसकी शुरुआत होती है 1994 में अक्टूबर माह में। उस वक्त पुलिस ने मालदीव की एक महिला मरियम राशिदा को तिरुवनंतपुरम से गिरफ्तार किया। राशिदा को इसरो के स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन की ड्राइंग की खुफिया जानकारी पाकिस्तान को बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। राशिदा की गिरफ्तार के बाद उसी साल नवम्बर में तिरुवनंतपुरम में इसरो के टॉप वैज्ञानिक और क्रायोजनिक प्रॉजेक्ट के डायरेक्टर नारायणन समेत दो वैज्ञानिकों डी शशिकुमारन और डिप्टी डायरेक्टर के चंद्रशेखर को गिरफ्तार कर लिया गया। इनके अलावा रूसी स्पेस एजेंसी के एक भारतीय प्रतिनिधि एसके शर्मा, एक लेबर कॉन्ट्रैक्टर और राशिदा की मालदीव की दोस्त फौजिया हसन को भी गिरफ्तार कर लिया गया। इन सभी पर पाकिस्तान और अन्य देशों को इसरो के रॉकेट इंजन की सीक्रेट जानकारी देने के आरोप थे। गिरफ्तारी के बाद इंटेलीजेंस ब्यूरो के अधिकारियों ने नारायणन से लम्बी पूछताछ की पर उन्हें नारायणन से यह सुनने को मिला कि वे बेकसूर है। सभी आरोप गलत हैं।
मामला टॉप लेवल का होने के कारण उसी साल दिसम्बर में मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई। सीबीआई को अपनी जांच में इंटेलीजेंस ब्यूरो और केरल पुलिस के आरोप सही नहीं मिले। इसके बाद जनवरी 1995 में इसरो के दो वैज्ञानिक को बेल पर रिहा कर दिया गया, लेकिन मालदीव की राशिदा और फौजिया को जमानत नहीं मिली। इसके बाद अप्रैल 1996 में सीबीआई ने चीफ जूडिशल मजिस्ट्रेट की अदालत में फाइल एक रिपोर्ट में बताया कि यह मामला फर्जी है और आरोपों के पक्ष में कोई सबूत नहीं हैं। मई 1996 में कोर्ट ने सीबीआई की रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और इसरो जासूसी केस में गिरफ्तार सभी आरोपियों को रिहा कर दिया।
कोर्ट के इस फैसले के बाद लग रहा था कि यह मामला सदा के लिए अब खत्म हो गया है, लेकिन सीपीएम की नई सरकार ने मामले की फिर से जांच का आदेश दिया। हालांकि मई 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार द्बारा इस मामले की फिर से जांच के आदेश को खारिज कर दिया। एक साल बाद 1999 में नारायणन ने मुआवजे के लिए याचिका दाखिल की। 2००1 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने केरल सरकार को क्षतिपूर्ति का आदेश दिया लेकिन राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती दी। सितंबर 2०12 में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को नारायणन को 1० लाख रुपये देने के आदेश दिए। इसके पांच साल बाद अप्रैल 2०17 में सर्वोच्च अदालत में नारायणन की याचिका पर उन पुलिस अधिकारियों पर सुनवाई शुरू हुई जिन्होंने वैज्ञानिक को गलत तरीके से केस में फंसाया था। नारायणन ने केरल हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें कहा गया था कि पूर्व डीजीपी और पुलिस के दो सेवानिवृत्त अधीक्षकों केके जोशुआ और एस विजयन के खिलाफ किसी भी कार्रवाई की जरूरत नहीं है। मई 2०18 में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई में जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डी वीआई चंद्रचूड़ की तीन जजों की बेंच ने कहा कि वह नारायणन को 75 लाख रुपये मुआवजा और उनकी प्रतिष्ठा को फिर से बहाल करने के बारे में विचार कर रहे हैं। इसी क्रम में 14 सितंबर 2०18 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्पीड़न का शिकार हुए वैज्ञानिक नारायणन को 5० लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
-----------------------------------------------------------------------------------
loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

E-Paper