यूपी के 21 चीनी मिलों की बिक्री के मामले की सीबीआई जांच पर रोक की मांग

Published: 16/05/2018 1:24 PM

नई दिल्ली: उत्तरप्रदेश के 21 चीनी मिलों की बिक्री के मामले की सीबीआई जांच के आदेश पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिका पर जल्द सुनवाई से इनकार कर दिया है। याचिका सच्चिदानंद शर्मा ने दाखिल की है। याचिका में यूपी सरकार द्वारा चीनी मिलों की बिक्री की सीबीआई जांच संबंधी नोटिफिकेशन पर रोक लगाने की मांग की गई है।

मामला मायावती के शासन काल के दौरान वर्ष 2010-11 में बेची गई 21 चीनी मिलों से जुड़ा है। बताया जा रहा है इन चीनी मिलों को बेचे जाने से प्रदेश सरकार को 1,179 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। उत्तरप्रदेश की योगी सरकार ने पिछले 12 अप्रैल को इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था। सीबीआई इस मामले में फर्जी कंपनियों और दस्तावेजों के उपयोग की जांच करेगी।

कैसे हुआ था घोटाला-

उत्तर प्रदेश में पिछली मायावती के नेतृत्व वाली बसपा सरकार में हुए उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम लिमिटेड के बिक्री घोटाले से प्रदेश को लगभग 1179.84 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। बसपा सरकार में नमक के भाव बेची गईं 21 चीनी मिलों की सीएजी जांच में कई ऐसे तथ्य सामने आये हैं जिनसे पता चला है कि माया ने शराब कारोबारी पोंटी चड्डा को फायदा दिलाने के लिए नियम कानून को अपनी मर्जी से तोडा मरोड़ा। आज जब उत्तर प्रदेश विधान सभा में सीएजी रिपोर्ट जारी हुई तो इस पर जमकर हंगामा हुआ। इसके बाद अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश पर आ गयी की वो जल्द से जल्द इस रिपोर्ट को आधार बना सख्त कार्यवाही करें।

सीएजी रिपोर्ट में सामने आया है कि सूबे की पिछली मुख्यमंत्री मायावती और उनके चहेते मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के संरक्षण में शराब कारोबारी पोंटी चड्ढा के स्वामित्व वाली कंपनियों को इन मीलों को न सिर्फ नमक के भाव बेचा गया बल्कि चीनी मिलें किसे बेचनी हैं? ये सक्षम अधिकारियों को बिडिंग-प्रक्रिया आरंभ होने से पहले ही पता था। बिडर्स यानि कि चड्डा की कंपनियों को वित्तीय बिड भी पहले ही बता दी गई थी ताकि उसे कोई परेशानी न हो, इस पर भी काम नहीं बना तब बिडिंग के मध्य में ही फेरबदल कर दिया गया।

पोंटी को इस डील में ज्यादा से ज्यादा फायदा हो सके इसके लिए माया के इशारे पर मिलों की भूमि उसके प्लांट और मशीनरी का मूल्य बाजार भाव से भी न्यूनतम कर दिया गया। सिर्फ इतने पर ही सरकार नहीं रुकी उसने रजिस्ट्री के लिए स्टाम्प ड्यूटी में भी कटौती कर दी गई। सीएजी रिपोर्ट में पता चला है कि चीनी मिलों का मूल्यांकन करने वालों ने साजिश रच मूल्यांकन किया जिससे चड्डा को तो लाभ हुआ लेकिन सरकार को 840.34 करोड़ की चपत लगी है।

सीएजी जांच में सामने आया है कि चीनी मिलें बेचने से सूबे को 1179.84 करोड़ से भी अधिक के राजस्व का नुकसान हुआ है। चड्डा से आर्थिक लाभ लेने वाले अधिकारी और मंत्री गठजोड़ ने चड्डा की कम्पनी को वित्तीय बिड पहले बता रखी थी इसके चलते सूबे के बुलंदशहर और सहारनपुर जिले की चीनी मिलों में वेव इंडस्ट्रीज और पंजाब फूड्स ही बिडर्स थे जिन्होंने 49 फीसदी की चोट सूबे के राजस्व को दी। वहीँ सरकारी उपक्रम इंडियन पोटाश ने 6 मिलों के लिए अपेक्षित मूल्य से कहीं ज्यादा बिड की लेकिन उसे कुछ नहीं मिला।

सूबे में मायाराज के दौरान वर्ष 2010 में जुलाई-अक्तूबर और इसके बाद वर्ष 2011 में जनवरी-मार्च तक 10 और 11 चीनी मिलों को बेचा गया। आपको जानकार हैरत होगी कि पहले दौर में बेचीं जाने वाली दस चीनी मिलों में से कुछ इंडियन पोटाश को मिल गयी लेकिन बाद की सभी चड्डा के खाते में गयी। पहले दौर में चीनी मिलो की बिडिंग करने वालीं दोनों कंपनियां चड्डा की ही थीं जबकि दूसरे दौर में बिडिंग करने वाली सभी कंपनियों के निदेशक आपस में जुड़े पाए गए। वेब इंडस्ट्री व समूह कंपनियों में त्रिलोचन सिंह 1/11 /1998 से निदेशक के पद पर हैं इसके साथ ही सिंह पीबीएस फूड्स प्राइवेट लिमिटेड में भी 4/5/2006 से निदेशक के साथ ही कंपनी में अंशधारक भी है। भूपिंदर सिंह एलिवेट इंटरटेनमेंट प्रालि. में 5/1/2005 से और एबी शुगर लि. में 1/5/2010 से 27/1/2010 तक निदेशक रहे इसके साथ ही भूपिंदर पीबीएस फूड्स प्राइवेट लिमिटेड में भी 4/5/2006 से निदेशक के साथ ही कंपनी में अंशधारक भी है। जुनेद अहमद रियल कोनर्जी इंडिया प्रालि. में 5/10/2006 से 22/7/2011 तक और जीएसआर होटल लिमिटेड में निदेशक के पद पर 22/8/2007 से कायम हैं।

इसके साथ ही जुनेद पीबीएस फूड्स प्राइवेट लिमिटेड में भी 4/5/2006 से निदेशक के साथ ही कंपनी में अंशधारक भी है। शिशिर रावत आरसीपीएल फ़ूड प्रोसेसिंग में 19/9/2005 से निदेशक है इसके साथ ही पीबीएस फूड्स प्राइवेट लिमिटेड में भी 4/5/2006 से निदेशक पद पर हैं। मनमीत सिंह एबी शुगर लिमिटेड में अतिरिक्त निदेशक के पद पर दिसंबर 2010 से कायम है इसके साथ ही ये पीबीएस फूड्स प्राइवेट लिमिटेड में सौ रुपये प्रति शेयर के हिसाब से 500 इक्वटी शेयर के मालिक हैं। कैग रिपोर्ट में सामने आया है की ये सभी कम्पनियाँ पोंटी की ही मिलकियत हैं।

इस सीएजी रिपोर्ट पर तत्कालीन माया सरकार ने जवाब दिया था कि चीनी मिलों का विनिवेश मंत्रिपरिषद से अनुमोदित है। यही नहीं सरकार की ओर से कहा गया कि मंत्रिपरिषद के निर्णय सीएजी आडिट के कार्यक्षेत्र बाहर हैं। बदले में सीएजी ने माया सरकार को जवाब दिया कि लेखा परीक्षा के संबंध में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का अधिकार क्षेत्र राज्य सरकार की 25 अप्रैल 2003 की अधिसूचना के अंतर्गत प्राप्त है।

मिलें जो बेचीं गयी:-

बरेली, भटनी, चेतानी, देवरिया,अमरोहा, बिजनौर,बुलंदशहर, चांदपुर, जरवलरोड रोड, खड्डा, रोहनकलां, सहारनपुर, सकौती टांडा व सिसवा बाजार, बेतालपुर, बाराबंकी, गुग्लीश लक्ष्मीगंज, रामकोला, शाहगंज व हरदोई।

इन सभी चीनी मिलों को बेचने की प्रक्रिया में साजिशों का चक्रव्यूह रचा गया जिसमें राजस्व को करोड़ों रुपये की हानि हुई लेकिन उन सभी को लाभ हुआ जो कहीं न कहीं से इस नीलामी से जुड़े हुए थे। मूल्यांकन के समय इन सभी मिलों की संपत्ति 1645.87 करोड़ आंकी गयी। इस पर निबंधन शुल्क 104.43 करोड़ तय हुआ। वहीँ चड्डा की कंपनियों द्वारा 440.75 करोड़ की कुल सम्पत्ति पर शुल्क के तौर पर सिर्फ 27.35 करोड़ ही तय किया गया। इस तरह पोंटी की कंपनियों ने निंबधन शुल्क के तौर पर सिर्फ 79.57 करोड़ का ही भुगतान किया। इससे विभाग को 100.47 करोड़ का नुकसान स्टाम्प शुल्क पर उठाना पड़ा । सीएजी ने अपनी जाँच रिपोर्ट में विभाग को कहा है कि वह अपने इस नुकसान की भरपाई के लिए उचित अपील करे।

यूपीएसएससीएल की मिलों में रजिस्ट्री शुल्क में चड्डा को कुल 841.54 करोड़ का फायदा दिया गया। चीनी मिलों की भूमि के मूल्य में कमी 90 फीसदी । डिसकाउंट कैश फ्लो मैथेड पर 243.48। प्लांट और मशीनरी का स्क्रैप के आधार पर मूल्यांकन 82.08। पुरानी और नई मिल की भूमि को एक समान मान कर 223.72 करोड़ में दिया गया। एक्सपेक्टेड मूल्य में 21.15 करोड़ का समायोजन किया गया। बिडर्स में प्रतिस्पर्धा न होने से 124.70 करोड़ का नुकसान प्रदेश के राजस्व को। कम स्टांप ड्यूटी लगा कर चड्डा को 53.71 करोड़ का लाभ। सलाहकार को 1.25 करोड़ का लाभ दिया गया ।

यूपीआरसीजीवीएनएल की मिलों में चड्डा को लाभ देने के लिए भूमि के मूल्य में 128.41 करोड़ की कमी की गयी। स्टाम्प डयूटी और पंजीकरण में 10.16 करोड़ की जो छूट दी गयी वो नहीं देनी चाहिए थी। बड़ी जमीनों पर 19.29 करोड़ की छूट बेवजह दी गयी। मशीनरी पर 43.20 करोड़ का लाभ चड्डा को मिला। एक्सपेटेड मूल्य पर 8.20 करोड़ का फायदा चड्डा की कंपनियों को दिया गया। कम्पनियाँ चड्डा की होने के कारण बिड प्रतिस्पर्धा का अभाव रहा जिस पर 81.98 करोड़ का फायदा चड्डा को मिला। सम्बंधित अधिकारियों द्वारा स्टांप डूयटी का कम निर्धारण किया गया जिससे 47.06 करोड़ का लाभ चड्डा को मिला। इस तरह जहाँ माया के करीबी चड्डा को यूपीआरसीजीवीएनएल की मिलों में 338.30 करोड़ का फायदा हुआ वहीँ प्रदेश को इतने का ही नुकसान हुआ।

इसके साथ ही रिपोर्ट में बताया गया है कि विकास, समाज और शिक्षा क्षेत्र को 2010-11 में पर्याप्त राजकोषीय सहायता नहीं दी गई। शिक्षा के सिवा अन्य में कुल व्यय का अनुपात सामान्य श्रेणी के सूबों के लिए औसत से कम था। करेत्तर राजस्व, सकल राज्य घरेलू उत्पाद अनुपात 2009-10 के 2.77 फीसदी की तुलना में 2010-11 में घटकर 1.90 फीसदी रह गया। इस रिपोर्ट में सरकारी निवेश पर भी प्रश्न खड़े किये गए हैं। कहा गया है कि निगमों, सरकारी कंपनियों, सहकारी समितियों में सूबे की सरकार के निवेश पर पिछले तीन साल में औसत प्राप्ति 0.033 फीसदी थी जबकि इसी अवधि में इसकी उधारियों पर अदा किया गया औसत ब्याज 6.67 प्रतिशत था।

राजकोषीय घाटा कम करने पर सरकार बधाई भी दी। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया कि राजस्व अधिशेष घटकर 3539 करोड़ हो गया लेकिन कम पूंजीगत व्यय के कारण राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के सापेक्ष 2.93 फीसदी घट गया। सिंचाई एवं लोक निर्माण विभाग की परियोजनाओं को राजस्व का बड़ा स्त्रोत बनाने के लिए सुधार की सिफारिश की गयी है। पिछले तीन वर्षों में उधार निधियों का 92 फीसदी ऋण देयताओं के निर्वहन में उपयोग किया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि सरकार ने इसके लिए एक सिकिंग फंड बनाया लेकिन यह कामयाब नहीं था।

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