2 रुपये की नौकरी करती थी ये लड़की, आज है 2000 करोड़ की कंपनी की मालकिन

2 रुपये की नौकरी से अपनी ज़िंदगी की शुरुवात करने वाली महिला आज कैसे बानी 2000 करोड़ की मालकिन? शायद आपको यकीन नहीं आएगा लेकिन यह कर दिखाया है कल्पना सरोज ने। कल्पना सरोज छह कंपनियों – कामनी ट्यूब्स लिमिटेड, कमानी स्टील री-रोलिंग मिल्स प्राइवेट लिमिटेड, साईकृपा शुगर फैक्ट्री प्राइवेट लिमिटेड, कल्पना बिल्डर्स एंड डेवलपर्स, कल्पना सरोज एंड एसोसिएट्स और केएस क्रिएशन्स फिल्म प्रोडक्शन की मालकिन हैं, जिसमे 600 लोग और संयुक्त कर्मचारी कार्यरत हैं। उनका सालाना कारोबार 2,000 करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है।

लेकिन कल्पना को यह सब कुछ ऐसे ही नहीं मिला। इसके पीछे संघर्ष की ऐसे कहानी छुपी है जो आपकी आंखें नम कर देगी। बचपन से ही उनकी संगर्ष भारी कहानी की शुरुवात हो चुकी थी। चलिए जानते हैं कल्पना सरोज की संघर्ष से लेकर सफलता की कहानी। कल्पना बचपन मे पड़ने-लिखने में काफी होनहार थी। वह पड़-लिख कर आगे बढ़ना चाहती थी लेकिन बावजूद इसके उन्हें शिक्षा से वंचित रहना पड़ा और नौंवी कक्षा के बाद उनकी शादी मात्र 12 साल की उम्र में करवा दी गयी। शादी के बाद हर लड़की का सपना होता है कि उसके ससुराल वाले प्यार करने वाले हों लेकिन कल्पना के साथ इसका उल्टा हुआ। ससुराल वाले हर छोटी बात पर ताने, मार-पीट और यहां तक कि ढंग का खाना और न ढंग के कपड़े नसीब हुआ करते। ऐसी घटिया मानसिकता वाले लोगों के बीच वह सबकुछ सहती रही।

शादी के 6 महीने बाद जब कल्पना के पिता उनसे मिलने पहुंचे तो उन्होंने पाया कि शांत, चंचल और हस्ते रहने वाली लड़की के व्यवहार में बदलाव क्यों? पूछे जाने पर वह लिपट के रोने लगी और अपने पिता को ससुराल की हकीकत बताई। पिता से यह दर्द सहा नही गया और उनको अपने साथ घर वापस ले आये। वह फिर से पढ़ना चाहती थी लेकिन समाज की मानसिकता भी उनके ससुराल वालों की तरह गहटिया निकली जिसके कारण घर के सदस्यों को भी लोग कोसने लगे। यह सब उनसे सहन नही हुआ और जिंदगी से हार मान कर उन्होंने जहर पी लिया, लेकिन डॉक्टरों की भरपूर कोशिसों की बदौलत वह बाच गयीं। अस्पताल में मिलने आये उनके रिश्तेदारों ने समझाया कि यदि कुछ करके मरना है तो कुछ कर के जीना सीखो। फिर क्या था, यह बात उनके दिल को छू गयी और ज़िंदगी का मतलब समझा गयी।

कल्पना ने अपनी जिंदगी में संघर्ष की कहानी को शुरू किया और नौकरी की तलाश करने लगी। एक पुलिस हवलदार की बेटी होने के नाते वह भी पुलिस या सेना में रहकर देश की सेवा करना चाहती थी लेकिन उनकी शिक्षा में कमी के कारण उन्हें यह नौकरी नही मिल सकी। बहुत मुश्किल से वह अपनी माँ को मना कर मुम्बई चली आयी, जहाँ एक होजरी कंपनी में उन्होंने मात्र दो रुपये प्रतिदिन की नौकरी मिली। उनके पिता रिटायरमेंट के बाद छोटी बहन को लेकर मुम्बई चले आये। छोटी बहन की अचानक तबियत खराब होने से मौत हो गयी, जिसके बाद उन्हें पैसों की अहमियत का पता चला कि दौलत की कमी के कारण अपने भी आंखों के सामने दम तोड़ देते हैं।

इस घटना के बाद उनके अंदर पैसे कमाने की ललक जाग उठी। इसी बीच उन्हें सरकार की एक स्कीम के तहत पचास हजार का लोन लिया और अपना बुटीक और फर्नीचर का बिज़नेस शुरू किया। इसके साथ-साथ उन्होंने पाया कि उनके जैसे व्यक्ति, जिनको सरकार नौकरी नही देमिल पाती उनके लिए ‘सुशिक्षित बेरिजगारी युवक संगठना’ बनायी। धीरे-धीरे उनका नाम होने लगा क्योकि नौजवानों को आवारागर्दी के बदले अपने पैरों पर खड़ा होने का मौका मिल रहा था। लोगों की तकलीफों को वह अच्छी तरह समझती थी इसी लिए जरूरतमंद लोग उनसे पास आया करते।

एक दिन प्लॉट की समस्या लेकर कोई व्यक्ति उनके पास पहुँचा और समस्या को सुलझाने के बाद वह बिल्डर बन गयी। पुरुष प्रधान देश मे एक दलित महिला बिल्डर बन जाये, यह किसी दूसरे बिल्डर को नही भाया और उनके नाम की सुपारी दे डाली और मारने की कोशिस की गई। जान का खतरा महसूस होते ही वह पुलिस कमिश्नर के पास पहुंची, जिसके बाद पुलिस ने बदमाशों को गिरफ्तार कर लिया। कल्पना ने कमिश्नर से रिवॉल्वर लाइसेंस की मांग की जिससे वह अपनी रक्षा खुद कर सके और उन्होंने रिवॉल्वर ले लिया।

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